Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 593
नित्येन क्सलोपविधायकं विधिसूत्रम्
क्सस्याचि
Aṣṭādhyāyī 7.3.72
Vṛtti Varadarājācārya

अजादौ तङि क्सस्य लोपः। अधुक्षाताम्। अधुक्षन्त। अदुग्धाः, अधुक्षथाः। अधुक्षाथाम्। अधुग्ध्वम्, अधुक्षध्वम्। अधुक्षि। अदुह्रहि, अधुक्षावहि। अधुक्षामहि।

अधोक्ष्यत। एवं दिह उपचये॥२२॥

लिह आस्वादने॥२३॥

लेढि। लीढः। लिहन्ति। लेक्षि। लीढे। लिहाते। लिहते। लिक्षे। लिहाथे। लीढ्वे। लिलेह, लिलिहे। लेढासि, लेढासे। लेक्ष्यति, लेक्ष्यते। लेढु। लीढाम्। लिहन्तु। लीढि। लेहानि। लीढाम्। अलेट्, अलेड्। अलिक्षत्, अलीढ, अलिक्षत। अलेक्ष्यत्, अलेक्षत।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५९३- क्सस्याचि। क्सस्य षष्ठ्यन्तम्, अचि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। घोर्लोपो लेटि वा से लोपः की अनुवृत्ति आती है। अग्रिम सूत्र लुग्वा दुहदिहलिहगुहामात्मनेपदे दन्त्ये से तङ् का अर्थबोधक आत्मनेपदे का अपकर्षण करके अचि का विशेष्य बनाया जाता है।

अजादि तङ् अर्थात् आत्मनेपद के परे होने पर क्स का लोप होता है।

यहाँ पर भी अलोऽन्त्यस्य की उपस्थिति से अन्त्य अल् अकार का लोप होकर स् शेष रहता है। अकार के लोप का प्रयोजन आतो ङितः से इय् आदेश को रोकना है, अन्यथा स के अदन्त होने पर इय् होकर अनिष्ट रूप बन जाता।

लुङ् प्रथमपुरुष के द्विवचन में अदुह्र+स्+आताम् है। यहाँ पर अजादि तङ् आताम् है। अतः क्सस्याचि से स के अकार का लुक् हुआ, अदुह्र+स्+आताम् बना। अब घत्व, भष्त्व, जश्त्व, चर्त्व, षत्व, क्षत्व करके अधुक्ष्+आताम् बना। वर्णसम्मेलन होकर अधुक्षाताम् सिद्ध हुआ। बहुवचन में झ के स्थान पर अन्त् आदेश होने से अजादि बन जाता है। अतः क्स के अकार का लोप आदि करके अधुक्षन्त बन जाता है। थास्, ध्वम्, वहि में विकल्प से लुक् होकर दो-दो रूप बनते हैं और आथाम् में क्यस्याचि से नित्य से लुक् होता है। शेष जगहों पर क्स का लुक् नहीं होता।

लुङ् आत्मनेपद के रूप- अदुग्ध-अधुक्षत, अधुक्षाताम्, अधुक्षन्त, अदुग्धाः-अधुक्षथाः, अधुक्षाथाम्, अधुग्ध्वम्-अधुक्षध्वम्, अदुह्रहि-अधुक्षावहि, अधुक्षामहि। लृङ्- अधोक्ष्यत्, अधोक्ष्यत।

दिह उपचये। दिह धातु उपचय अर्थात् वृद्धि, बढ़ाना अर्थ में है। इसके रूप दुह् की तरह ही होते हैं। अन्तर यह है कि दुह् को गुण होने पर ओकार दोह् होता है तो दिह्

.....

में इकार को गुण होकर एकार देह बनता है। कुछ आचार्यों ने इसका एक अर्थ लेप करना भी माना है और देह, सन्देह, देहिन् आदि शब्दों की सिद्धि भी इसी धातु से बताई है।

लट्-(परस्मैपद)देग्धि, दिग्धः, दिहन्ति। धेक्षि, दिग्धः, दिग्ध, देह्यि, दिह्वः, दिह्यः।

(आत्मनेपद) दिग्धे, दिहाते, दिहते, धिक्षे, दिहाथे, धिग्ध्वे, दिहे, दिह्वहे, दिह्यहे।

लिट्- दिदेह, दिदिहतुः, दिदिहुः। दिदिहे, दिदिहाते, दिदिहिरे।

लुट्- देग्धा, देग्धारौ, देग्धारः, देग्धासि। देग्धासे, देग्धासाथे, देग्धाध्वे।

लृट्- धेक्ष्यति, धेक्ष्यतः, धेक्ष्यन्ति। धेक्ष्यते, धेक्ष्येथे, धेक्ष्यध्वे।

लोट्- दिग्धु-दिग्धात्, दिग्धाम्, दिहन्तु, दिग्धि-दिग्धात्, दिग्धम्, दिग्ध, देहानि, देहाव, देहाम।

दिग्धाम्, दिहाताम्, दिहताम्, धिक्ष्व, दिहाथाम्, धिग्ध्वम्, देहै, देहावहै, देहामहै।

लङ्- अधेक्-अधेग्, अदिग्धाम्, अदिहन्। अदिग्ध, अदिहाताम्, अदिहत।

विधिलिङ्- दिह्यात्, दिह्याताम्, दिह्युः। दिहीत, दिहीयाताम्, दिहीरन्।

आशीर्लिङ्- दिह्यात्, दिह्यास्ताम्, दिह्यासुः। धिक्षीष्ट, धिक्षीयास्ताम्, धिक्षीरन्।

लुङ्- अधिक्षत्, अधिक्षताम्, अधिक्षन्। अदिग्ध-अधिक्षत, अधिक्षाताम्, अधिक्षन्त।

अदिग्धाः-अदिक्षाः, अधिक्षाताम्, अधिग्ध्वम्-अधिक्षध्वम्, अधिक्षि, अधिह्वहि-अधिक्षावहि, अधिक्षामहि।

लृङ्- अधेक्ष्यत्, अधेक्ष्यताम्, अधेक्ष्यन्। अधेक्ष्यत, अधेक्ष्येताम्, अधेक्ष्यन्त।

लिह आस्वादने। लिह धातु आस्वादन अर्थात् चाटना अर्थ में है। स्वरित अकार की इत्संज्ञा होने के कारण उभयपदी है। लिह् शेष रहता है। दकारादि न होने के कारण दादेर्धातोर्धः का विषय नहीं है और वश् प्रत्याहार के वर्ण न होने के कारण एकाचो बशो भप् झषन्तस्य स्थ्वोः का भी विषय नहीं है। हकारान्त होने के कारण हो ढः से ढत्व होता है।

लेढि। लिह् से लट्, परस्मैपद तिप्, शप्, उसका लुक्, लघूपधगुण करके लेह्+ति बना। हो ढः से ढत्व करके झषस्तथोर्धोऽधः से ति के तकार को धकार करके लेह्+धि बना। ढकार के योग में धकार को ष्टुत्व होकर ढकार हुआ, लेह्+ढि बना। ढो ढे लोपः से पूर्व ढकार का लोप होकर लेढि सिद्ध हुआ। द्विवचन आदि अपित् में सार्वधातुकमपित् से डित्व हो जाने के कारण गुण का निषेध होता है। अतः लि+ढस् बना हुआ है। ढूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से पूर्व के अण् इकार को दीर्घ होकर लीढः सिद्ध हुआ। बहुवचन में झल् परे न होने कारण ढत्व नहीं हुआ, केवल वर्णसम्मेलन करके लिहन्ति बनता है। सिप् में गुण होकर लेह्+सि बना है। षढोः कः सि से ढकार को ककार और ककार से परे सि के सकार को षत्व और ककार तथा षकार के संयोग में क्षकार लेक्षि सिद्ध हुआ। थस् में ढत्व, धत्व, ष्टुत्व, ढकार का लोप, दीर्घ करके लीढः बनता है। थ में इसी प्रकार से लीढ बनता है। उत्तमपुरुष में झल् न मिलने के कारण ढत्व नहीं होता। अतः वर्णसम्मेलन करके लेह्यि, लिह्वः, लिह्यः सिद्ध होते हैं। इस तरह परस्मैपद में रूप बने-लेढि, लीढः, लिहन्ति, लेक्षि, लीढः, लीढ, लेह्यि, लिह्वः, लिह्यः। आत्मनेपद में कोई कठिनाई नहीं है। अपित् होने के कारण गुण कहीं भी नहीं होता है और जहाँ झलादि मिलता है, वहाँ ढत्व होगा, अन्यत्र नहीं। ढकार के बाद तकार और थकार को धकार आदेश और उसके स्थान पर ष्टुत्व होकर ढकार आदि करके ढलोप, दीर्घ आदि होकर रूप बनते हैं-लीढे, लिहाते, लिहते, लिक्षे, लिहाथे, लीढ्वे, लिहे, लिह्वहे, लिह्यहे।

लिट् में दोनों पदों में दुह् की तरह ही रूप बनते हैं- लिलेह, लिलिहतुः, लिलिहुः, लिलेहिथ, लिलिहथुः, लिलिह, लिलेह, लिलिहिव, लिलिहिम। लिलिहे, लिलिहाते, लिलिहिरे, लिलिहिषे, लिलिहाथे, लिलिहिद्वे-लिलिहिध्वे, लिलिहे, लिलिहिवहे, लिलिहिमहे।

लृट् में लघूपधगुण होकर लेह्+ता बनने के बाद ढत्व, धत्व, ष्टुत्व करके लेद्+ढा बनता है। ढकार का लोप करके लेढा सिद्ध हो जाता है। लेढा, लेढारौ, लेढारः, लेढासि। लेढासे, लेढासाथे, लेढाध्वे, लेढाहे, लेढास्वहे, लेढास्महे।

लृट् में लघूपधगुण, ढत्व करके लेद्+स्यति बना। षढोः कः सि से ढकार को ककार और ककार से परे सकार को आदेशप्रत्यययोः से षत्व करके लेक्+ष्यति बना। ककार और षकार के संयोग से ककार होकर लेक्ष्यति सिद्ध हुआ। लेक्ष्यति, लेक्ष्यतः, लेक्ष्यन्ति। लेक्ष्यते, लेक्ष्येते, लेक्ष्यन्ते आदि।

लोट् में लट् की तरह ही कार्य होकर कुछ विशेष कार्य उत्व आदि होते हैं- लेढु-लीढात्, लीढाम्, लिहन्तु। सिप् में- लिह् सि, लिह् हि, लिह् हि होने के बाद हुझल्भ्यो हेर्धिः से हि को धि, लिह् धि, ष्टुत्व, पूर्व के ढ का लोप, दीर्घ होकर लीढि बनता है। तातङ् होने के पक्ष में- लीढात्। आगे- लीढम्, लीढ, लेहानि, लेहाव, लेहाम। आत्मनेपद में- लीढाम्, लिहाताम्, लिहताम्, लिक्ष्व, लिहाथाम्, लीढ्वम्, लेहै, लेहावहै, लेहामहै।

लङ् में तिप्, अट् का आगम, शप्, उसका लुक्, इकार का लोप, लघूपधगुण करके अलेह्+त् बना है। हल्ङ्याढ्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से अपृक्त तकार का लोप करके पदान्त हकार को ढत्व, जश्त्व करके, वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व करके अलेट्-अलेङ् ये दो रूप बनते हैं। सिप् में भी ये ही रूप बनते हैं क्योंकि वहाँ अपृक्त सकार का लोप होता है। अन्य रूपों में कोई विशेषता नहीं है। परस्मैपद के रूप- अलेट्-अलेङ्, अलीढाम्, अलिहन्, अलेट्-अलेङ्, अलीढम्, अलीढ, अलेहम्, अलिह्, अलिह्म। आत्मनेपद- अलीढ, अलिहाताम्, अलिहत, अलीढाः, अलिहाथाम्, अलीढ्वम्, अलिहि, अलिह्हि, अलिह्महि।

विधिलिङ्- लिह्यात्, लिह्याताम्, लिह्युः। लिहीत, लिहीयाताम्, लिहीरन्।

आशीर्लिङ्- लिह्यात्, लिह्यास्ताम्, लिह्यासुः। लिक्षीष्ट, लिक्षीयास्ताम्, लिक्षीरन्।

लुङ् परस्मैपद में- अधुक्षत् की तरह ही- अलिक्षत्, अलिक्षताम्, अलिक्षन्। आत्मनेपद में दन्त्यादि प्रत्ययों में लुग्वा दुहदिहलिहगुहामात्मनेपदे दन्त्ये से क्स के अकार का वैकल्पिक लुक् और अजादि के परे क्सस्याचि से नित्य से क्स के अकार का लोप होता है। इस तरह रूप बनते हैं- अलीढ-अलिक्षत, अलिक्षाताम्, अलिक्षन्त, अलीढाः-अलिक्षथाः, अलिक्षाथाम्, अलीढ्वम्-अलिक्षध्वम्, अलिक्षि, अलिह्हि-अलिक्षावहि, अलिक्षामहि।

लृङ्- अलेक्ष्यत्, अलेक्ष्यताम्, अलेक्ष्यन्। अलेक्ष्यत, अलेक्ष्येताम्, अलेक्ष्यन्त।

ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि। ब्रूञ् धातु स्पष्ट बोलना अर्थ में है जैसे- रामो ब्रवीति, किन्तु अश्वो ब्रवीति नहीं होगा क्योंकि घोड़े आदि पशुओं की बोली अस्पष्ट है। जकार की इत्संज्ञा होती है। जित् होने के कारण स्वरितजित कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से उभयपदी है। चकारान्त अनिट् धातुओं में वच् के रूप में इसकी गणना है।