Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 592
वैकल्पिकक्सलोपविधायकं विधिसूत्रम्
लुग्वा दुहदिहलिहगुहामात्मनेपदे दन्त्ये
Aṣṭādhyāyī 7.3.73
Vṛtti Varadarājācārya

एषां क्सस्य लुग्वा स्याद् दन्त्ये तङि। अदुग्ध, अधुक्षत।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५९२- लुग्वा दुह-दिह-लिह-गुहामात्मनेपदे दन्त्ये। दुहश्च दिहश्च लिहश्च गुह् च तेषामितरेतरद्वन्द्वः दुहदिहलिहगुहः, तेषां दुहदिहलिहगुहाम्। दन्तेषु भवो दन्त्यः ( शरीरावयवाद्यत् ) लुक् प्रथमान्तं, वा अव्ययपदं, दुहदिहलिहगुहां षष्ठ्यन्तम्, आत्मनेपदे सप्तम्यन्तं, दन्त्ये सप्तम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। क्सस्याचि से क्सस्य की अनुवृत्ति आती है।

दुह्, दिह्, लिह् और गुह् धातुओं से परे क्स का विकल्प से लुक् होता है दन्त्यादि तङ् के परे होने पर।

आत्मनेपद में दन्त्यादि त, थास्, ध्वम् और वहि है। इनके परे होने पर विकल्प से और अग्रिम सूत्र से अच् के परे होने पर नित्य से क्स का लोप होता है। अलोऽन्त्यस्य की उपस्थिति से अन्त्य अल् अकार मात्र का लोप होता है और स् शेष रहता है।

अदुग्ध, अधुक्षत। दुह् से लुङ् लकार, अट् का आगम, त, च्लि, उसके स्थान पर सिच् प्राप्त था, उसे बाधकर शल इगुपधादनिटः क्सः से क्स हुआ। उसका त के परे

होने पर अलोऽन्त्यस्य की सहायता से लुग्वा दुहदिहलिहगुहामात्मनेपदे दन्त्ये से विकल्प से स के अकार का लुक् हुआ। अदुह्र+स्+त बना। सकार का झलो झलि से लोप हुआ। अब घत्व, होकर अदुघ्+त बना। सकारादि प्रत्यय न होने के कारण भष्त्व नहीं हुआ। घकार से परे तकार को झषस्तथोर्धोऽधः से घकार आदेश होकर अदुघ्+ध बना। घकार को जश्त्व होकर गकार बना। इस तरह अदुग्ध सिद्ध हुआ। क्स के लुक् न होने के पक्ष में अदुह्र+स्+त है। घत्व, भष्त्व, जश्त्व करके अधुक्+स्+त बना। ककार से परे सकार को पत्व और क्+ष् का क्षत्व होकर अधुक्षत सिद्ध हुआ।