इगुपधो यः शलन्तस्तस्मादनिटश्च्लेः क्सादेशः स्यात्। अधुक्षत्।
५९१- शल इगुपधादनिटः क्सः। शलः पञ्चम्यन्तम्, इगुपधाद् पञ्चम्यन्तम्, अनिटः षष्ठ्यन्तं, क्सः प्रथमान्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। च्लेः सिच् से च्लेः और धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् से धातोः की अनुवृत्ति आती है।
इक् जिसकी उपधा में हो ऐसा जो शल् अन्त वाला धातु, उससे परे अनिट् च्लि के स्थान पर क्स आदेश होता है।
यह सूत्र च्लेः सिच् का अपवाद है और ककार की इत्संज्ञा होकर स यह अदन्त ही शेष रहता है। क्स और सिच् में यही अन्तर है कि क्स कित् है और अदन्त स शेष रहता है सिच् में केवल स् बचता है।
अधुक्षत्। दुह् से लुङ्, अट् का आगम, त, च्लि, उसके स्थान पर सिच् प्राप्त, उसे बाधकर शल इगुपधादनिटः क्सः से क्स आदेश, अनुबन्धलोप करके अदुह्+स्+त बना। स कित् है, अतः क्ङिति च से लघूपधगुण का निषेध हुआ। अब घत्व, भष्त्व, जश्त्व, चर्त्व, षत्व करके अधुक्षत् सिद्ध हुआ।
परस्मैपद लुङ् के रूप- अधुक्षत्, अधुक्षताम्, अधुक्षन्, अधुक्षः, अधुक्षतम्, अधुक्षत, अधुक्षम्, अधुक्षाव, अधुक्षाम।