Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 590
किद्वद्भावविधायकमतिदेशसूत्रम्
लिङ्सिचावात्मनेपदेषु
Aṣṭādhyāyī 1.2.11
Vṛtti Varadarājācārya

दुह प्रपूरणे॥ २१॥ दोग्धि। दुग्धः। दुहन्ति। धोक्षि। दुग्धे। दुहाते।

दुहते। धुक्षे। दुहाथे। धुग्ध्वे। दुहे। दुह्वहे, दुद्वहे। दुदोह, दुदुहे। दोग्धासि,

दोग्धासे। धोक्ष्यति, धोक्ष्यते। दोग्धु-दुग्धात्। दुग्धाम्। दुहन्तु। दुग्धि-दुग्धात्।

दुग्धम्। दुग्ध। दोहानि। दोहाव। दोहाम। दुग्धाम्। दुहाताम्। दुहताम्।

धुक्ष्व। दुहाथाम्। धुग्ध्वम्। दोहै। दोहावहै। दोहामहै। अधोक्। अदुग्धाम्।

अदुहन्। अदोहम्। अदुग्ध। अदुहाताम्। अदुहत। अधुग्ध्वम्। दुह्यात्।

दुहीत।

.....

इक्समीपाद्धलः परौ झलादी लिङ्सिचौ कितौ स्तस्तङि। धुक्षीष्ट।

.....

दोहानि, दोहाव, दोहाम। आत्मनेपद में- दुग्धाम्, दुहाताम्, दुहताम्, धुक्ष्व, दुहाथाम्, धुग्ध्वम्, दोहै, दोहावहै, दोहामहै।

लङ् के रूप परस्मैपद में- अधोक्-अधोग्, अदुग्धाम्, अदुहन्, अधोक्-अधोग्, अदुग्धम्, अदुग्ध, अदोहम्, अदुह्, अदुह्य। आत्मनेपद में- अदुग्ध, अदुहाताम्, अदुहत, अदुग्धाः, अदुहाथाम्, अधुग्ध्वम्, अदुहि, अदुह्रहि, अदुह्रहि!

विधिलिङ्, परस्मैपद- दुह्यात्, दुह्याताम्, दुह्युः, दुह्याः, दुह्यातम्, दुह्यात, दुह्याम्, दुह्याव, दुह्याम। आत्मनेपद- दुहीत, दुहीयाताम्, दुहीरन्, दुहीथाः, दुहीयाथाम्, दुहीध्वम्, दुहीय, दुहीवहि, दुहीमहि।

आशीर्लिङ्, परस्मैपद- दुह्यात्, दुह्यास्ताम्, दुह्यासुः, दुह्याः, दुह्यास्तम्, दुह्यास्त, दुह्यासम्, दुह्यास्व, दुह्यास्म।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

लङ्- में दुह् लङ्, अट् आगम, तिप्, शप्, उसका लुक्, ति में इकार का इतश्च से लोप करके अदुह् त् बना है। लघूपधगुण होकर अदोह्+त् बना। तकार का हल्ङ्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके अदोह् में पदान्त हकार के स्थान पर दादेर्धातोर्घः से घकार आदेश और धातु के आदि दकार को एकाचो बशो भप् झषन्तस्य स्ध्वोः से भप् करके घकार को जश्त्व करने पर अधोग् बना। वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व करके अधोक्, अधोग् ये दो रूप बनते हैं। द्विवचन में अदुह्+ताम् है। घत्व, धत्व, जश्त्व करके अदुग्धाम् बनता है। बहुवचन में अदुह्+अन्ति है। इकार का लोप, तकार का संयोगान्तलोप करके अदुह्+अन् बना। वर्णसम्मेलन करके अदुहन् सिद्ध हुआ। सिप् में तिप् की तरह अधोक्, अधोग् बनते हैं। थस् और थ में तस् की तरह अदुग्धम्, अदुग्ध बनते हैं। उत्तमपुरुष में अदोहम्, अदुह्, अदुह्य।

दुह प्रपूरणे। दुह धातु प्रपूरण अर्थात् दुहना अर्थ में है। अकार की इत्संज्ञा होती है और दुह् शेष रहता है। अनिट् धातुओं की गणना में आता है। अनिट् होते हुए अजन्त एवं अकारवान् न होने से थल् में नित्य से इट् होता है।

दोग्धि। दुह् से लट्, परस्मैपद में ति, शप्, उसका लुक् करके दुह्+ति है। लघूपधगुण करके दोह्+ति बना। दादेर्धातोर्घः से हकार के स्थान पर घकार आदेश और झषस्तथोर्धोऽधः से ति के तकार के स्थान पर धकार आदेश करके दोघ्+धि बना। घकार के स्थान पर झलां जश् झशि से जश्त्व गकार होकर दोग्धि सिद्ध हुआ।

दुग्धः। द्विवचन में सारी प्रक्रिया दोग्धि की तरह किन्तु अपित् सार्वधातुक डित् होने के कारण गुण का निषेध हुआ। दुग्+धस्=दुग्धः।

.....

दुहन्ति। बहुवचन में झल् परे न मिलने के कारण दादेधातोर्घः से घकार नहीं हुआ और तकार एवं थकार न होने के कारण धकार भी नहीं हुआ तो दुह्+अन्ति में केवल वर्णसम्मेलन होकर दुहन्ति सिद्ध हुआ।

धोक्षि। दुग्धः। दुग्ध। दुह् से सिप्, शप्, शब्लुक् करके दुह्+सि है। गुण करके दादेधातोर्घः से हकार के स्थान घकार आदेश करके दोघ्+सि बना। एकाचो बशो भष् झषन्तस्य स्ध्वोः से सकार के परे होने के कारण धातु के दकार के स्थान पर भष् होकर धकार होता है। इस तरह धोघ्+सि बना। घकार को जश्त्व करके गकार और गकार को सकार के परे रहते खरि च से चर्त्व होकर ककार हुआ और ककार से परे सि के सकार को पत्व होकर धोक्+षि बना। क् और ष् के संयोग होने पर क्ष् होता है। अतः धोक्षि यह रूप सिद्ध हुआ। प्रथमपुरुष के द्विवचन की तरह मध्यमपुरुष के द्विवचन और बहुवचन में दुग्धः, दुग्ध बन जाते हैं, क्योंकि झषस्तथोर्धोर्घः यह सूत्र तकार और थकार दोनों के स्थान पर धकार आदेश करता है।

दोहि। दुह्वः। दुह्वः। उत्तमपुरुष में झल् के परे न होने के कारण घकार आदेश नहीं हुआ। केवल वर्णसम्मेलन करके उक्त तीनों रूप बन जाते हैं।

लट् के परस्मैपद में- दोग्ध, दुग्धः, दुहन्ति, धोक्षि, दुग्धः, दुग्ध, दोहि, दुह्वः, दुह्वः। आत्मनेपद में पित् न होने के कारण सभी प्रत्यय सार्वधातुकमपित् से डित् होते हैं, अतः गुण का प्रसंग नहीं है किन्तु घकार आदेश, सकार और ध्वम् के परे रहने पर दकार को धकार आदेश, केवल त के स्थान पर धकार आदेश होकर सिद्ध होते हैं, साथ ही आताम्, झ, आथाम् में अजादि के परे होने के कारण केवल वर्णसम्मेलन होता है। उत्तमपुरुष में परस्मैपद की तरह केवल वर्णसम्मेलन करना होता है। वाकी शप्, शप् का लुक्, एत्व आदि तो होते ही हैं।

लट् के आत्मनेपद में- दुग्धे, दुहाते, दुहते, धुक्षे, दुहाथे, धुग्ध्वे, दुहे, दुह्वहे, दुह्वहे। दुदोह, दुदुहे। लिट् में द्वित्व, हलादिशेष, गुण और गुण का निषेध आदि करके रूप बनते हैं।

लिट् के परस्मैपद में- दुदोह, दुदुहतुः, दुदुहुः, दुदोहिथ, दुदुहथुः, दुदुह, दुदोह, दुदुहिव, दुदुहिम। आत्मनेपद- दुदुहे, दुदुहाते, दुदुहिरे, दुदुहिषे, दुदुहाथे, दुदुहिद्वे-दुदुहिध्वे, दुदुहे, दुदुहिवहे, दुदुहिमहे। अनिट् धातु के होते हुए भी क्रादिनियम से लिट् में इट् हो जाता है।

लृट् में ता के तकार को झल् परे मानकर दादेधातोर्घः से हकार के स्थान पर घकार आदेश और तकार के स्थान पर झषस्तथोर्धोऽधः से धकार एवं गुण करके दोग्धा बनता है। परस्मैपद में- दोग्धा, दोग्धारौ, दोग्धारः, दोग्धासि, दोग्धास्थः, दोग्धास्थ, दोग्धास्मि, दोग्धास्वः, दोग्धास्मः। आत्मनेपद में- दोग्धा, दोग्धारौ, दोग्धारः, दोग्धासे, दोग्धासाथे, दोग्धाध्वे, दोग्धाहे, दोग्धास्वहे, दोग्धास्महे।

लृट् में स्य के सकार के परे रहते घत्व, भष्त्व, षत्व, चर्त्व, क्षत्व होकर धोक्ष्यति, धोक्ष्यतः आदि रूप बनते हैं। परस्मैपद में- धोक्ष्यति, धोक्ष्यतः, धोक्ष्यन्ति, धोक्ष्यसि, धोक्ष्यथः, धोक्ष्यथ, धोक्ष्यामि, धोक्ष्यावः, धोक्ष्यामः। आत्मनेपद में- धोक्ष्यते, धोक्ष्येते, धोक्ष्यन्ते, धोक्ष्यसे, धोक्ष्येथे, धोक्ष्यध्वे, धोक्ष्ये, धोक्ष्यावहे, धोक्ष्यामहे।

लोट् में सभी कार्य लट् की तरह ही होते हैं। किन्तु लोट् के विशेष कार्य होकर रूप बनते हैं- परस्मैपद में- दोग्धु-दुग्धात्, दुग्धाम्, दुहन्तु, दुग्धि-दुग्धात्, दुग्धम्, दुग्ध,

५९०- लिङ्सिचावात्मनेपदेषु। लिङ् च सिच् च तयोरितरेतरद्वन्द्वो लिङ्सिचौ। लिङ्सिचौ प्रथमान्तम्, आत्मनेपदेषु सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इको झल् सम्पूर्ण सूत्र, हलन्ताच्च से हलन्तान्त् और असंयोगाल्लिट् कित् से कित् की अनुवृत्ति आती है। झल् जो है यह लिङ्सिचौ का विशेषण है और हलन्तात् का अर्थ है समीपवर्ती हल् से।

इक् के समीप जो हल् उससे परे झलादि लिङ् और सिच् कित् होते हैं तङ् के परे होने पर।

लिङ् लकार में लिङ् के स्थान पर त, आताम् आदि आदेश हुए हैं। उनको सीयुट् करके झलादि होने से वे कित् हो जाते हैं और लुङ् लकार का सिच् कित् हो जाता है।

धुक्षीष्ट। दुह् से आशीर्लिङ्, त, सीयुट्, सुट् करके दुह्+सीय्+स्+त बना है। यहाँ दकारोत्तरवर्ती उकार इक् है, इसके समीप् हल् है ह्, उससे परे झलादि लिङ् है- सीय्+स्+त। अतः लिङ्सिचावात्मनेपदेषु से उसको कित्व अर्थात् किद्वद्भाव हुआ। कित् के परे होने पर दुह् में प्राप्त लघूपधगुण का निषेध हुआ। इसके बाद हकार को घत्व, घकार को जश्त्व करके गकार, दकार को भप्त्व करके धकार बना, सकार के परे होने पर गकार

को चर्त्व होकर ककार, ककार से परे सकार को षत्व करके धुक्+षीय्+स्+त बना। ककार और षकार के संयोग से क्षकार, यकार का लोप करके धुक्षी+स्+त बना। सकार को षत्व और उसके योग में तकार को ष्टुत्व होकर धुक्षीष्ट सिद्ध हुआ।

आशीर्लिङ् के रूप- धुक्षीष्ट, धुक्षीयास्ताम्, धुक्षीरन्, धुक्षीष्ठाः, धुक्षीयास्थाम्, धुक्षीध्वम्, धुक्षीय, धुक्षीवहि, धुक्षीमहि।