Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
Show
VṛttiGovind
LSK 584
गुणविधायकं विधिसूत्रम्
शीङः सार्वधातुके गुणः
Aṣṭādhyāyī 7.4.21
Vṛtti Varadarājācārya

क्ङिति चेत्यस्यापवादः। शेते। शयाते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

शीङ् स्वप्ने। शीङ्-धातु शयन करना अर्थात् सोना अर्थ में है। डकार की इत्संज्ञा होती है। शी बचता है। डित् होने के कारण अनुदात्तडित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदी होता है। यह धातु सेद् है अर्थात् इससे परे वलादि आर्धधातुक को इद् होता है।

५८४- शीङः सार्वधातुके गुणः। शीङः षष्ठ्यन्तं, सार्वधातुके सप्तम्यन्तं, गुणः प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

सार्वधातुक परे हो तो शीङ् को गुण हो जाता है।

आत्मनेपद में पित् कोई नहीं है, अतः सार्वधातुकमपित् से डित् हो जाने के कारण गुण नहीं हो पा रहा था, अतः इस सूत्र का आरम्भ किया गया। यह केवल सार्वधातुक के परे होने पर ही अर्थात् लट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ् में ही लगता है।

शेते। शी से लट्, त, शप्, शप् का लुक करके शी+त बना। शीङः सार्वधातुके गुणः से शी के ईकार को गुण होकर शे+त बना। टित आत्मनेपदानां टेरेः से एत्व होकर शेते सिद्ध हुआ। द्विवचन में शी+आताम् में भी गुण और एत्व करके शे+आते बना। अय् आदेश होकर शयाते सिद्ध होता है।