गातिस्थेति सिचो लुक्।
अगात्। ऐष्यत्। शीङ् स्वप्ने॥१९॥
५८३- इणो गा लुङि। इणः षष्ठ्यन्तं, गा लुप्तप्रथमाकं पदं, लुङि वैषयिकं सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।
लुङ् की विवक्षा में इण् धातु के स्थान पर गा आदेश होता है।
गा आदेश लुङ् की विवक्षा में होता है, अन्यथा इङ् धातु के अजादि होने के कारण आडजादीनाम् से आद् आगम होने के बाद ही गा आदेश होता। यहाँ पर गा आदेश पहले होने के कारण आद् आगम न होकर अद् होता है।
अगात्। इ-धातु से लुङ् की विवक्षा में गा आदेश, उसके बाद लुङ् लकार अद् आगम, ति, च्लि, सिच् करके अ+गा+स्+त् बना। गातिस्थाधुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु से सिच् का लुक्, सिच् के अभाव में अस्तिसिचोऽपृक्ते से ईद् नहीं हुआ। इस तरह अगात् सिद्ध हुआ।
लुङ्- अगात्, अगाताम्, अगुः, अगाः, अगातम्, अगात, अगाम्, अगाव, अगाम।
लृङ्- ऐष्यत्, ऐष्यताम्, ऐष्यन्, ऐष्यः, ऐष्यतम्, ऐष्यत, ऐष्यम्, ऐष्याव, ऐष्याम।
परस्मैपदी धातुओं का विवेचन करके अब आत्मनेपदी धातुओं का विवेचन प्रारम्भ करते हैं।