उपसर्गात्परस्य इणोऽणो ह्रस्व आर्धधातुके किति लिङ् निरियात्।
उभयत आश्रयणे नान्तादिवत्। अभीयात्। अणः किम्? समेयात्।
५८२- एतेर्लिङ्। एतेः षष्ठ्यन्तं, लिङ् सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। केऽणः से अणः, उपसर्गात् ह्रस्व ऊहतेः से उपसर्गात् और ह्रस्वः तथा अयङ् यि क्ङिति से किति की अनुवृत्ति आती है।
उपसर्ग से परे इण्-धातु के अण् को ह्रस्व आदेश होता है आर्धधातुक कित् लिङ् के परे होने पर।
निरियात्। इण् धातु के आशीर्लिङ् में निर् उपसर्ग पूर्वक निर्+ईयात् है। एतेर्लिङ् से ई को ह्रस्व होकर निरियात् बना।
उभयत आश्रयणे नान्तादिवत्। यह परिभाषा है। एक ही काल में दोनों ओर का आश्रयण करने पर अन्तादिवच्च नहीं लगता।
अभि+ईयात् में सवर्णदीर्घ होकर अभीयात् बना। यहाँ पर सवर्णदीर्घ होकर बने ई को अन्तादिवच्च से पर का आदि भाग मान कर ईयात् बन जाने से इण् धातु का अण् मिल जाता है और इधर इसी तरह ई को पूर्व का अन्तभाग मान कर अभि यह उपसर्ग का भी मान लिया जाता है। इस प्रकार से उपसर्ग से परे इण् के इकार को एतेर्लिङ् से ह्रस्व हो जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में एक न्याय उपस्थित होता है- उभयत आश्रयणे नान्तादिवत् अर्थात् अन्तादिवच्च से एक ओर आश्रय करके अन्तादिवद्भाव किया जा सकता है किन्तु दोनों ओर आश्रय करके नहीं किया जा सकता। जैसे कि यहाँ पर उपसर्ग और अण् दोनों का आश्रय हो रहा है। अतः अन्तादिवद्भाव नहीं हुआ और उपसर्ग से परे अण् न मिलने के कारण ह्रस्व भी नहीं हुआ- अभीयात्।
अणः किम्? समेयात्। अब प्रश्न करते हैं कि इस सूत्र में अणः की अनुवृत्ति नहीं लाते तो क्या होता? उत्तर दिया समेयात्। सम्+आ ये दो उपसर्ग हैं और ईयात् यह आशीर्लिङ् का रूप है। आ+ईयात् में गुण होकर एयात् बना। सम्+एयात्=समेयात् बना। सूत्र में अणः कहने से एकार अण् में नहीं आता, अतः ह्रस्व नहीं होता। अन्यथा उक्त सूत्र से ह्रस्व हो जाता और समियात् ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता।