अभ्यासस्य इवर्णोवर्णयोरियङ्कुवङौ स्तोऽसवर्णेऽचि। इयाय।
५८०- अभ्यासस्यासवर्णे। न सवर्णः असवर्णः, तस्मिन् असवर्णे। अभ्यासस्य षष्ठ्यन्तम्, असवर्णे सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङ्कुवङौ से अचि, य्वोः और इयङ्कुवङौ की अनुवृत्ति आती है।
असवर्ण अच् के परे होने पर अभ्यास के इवर्ण और उवर्ण के स्थान पर क्रमशः इयङ् और उवङ् आदेश होते हैं।
इयाय। इण् से लिट्, तिप्, णल्, अ, इ+अ बना। इ को द्वित्व करके इइ+अ बना। द्वितीय इकार को अचो ज्याति से वृद्धि होकर इऐ+अ बना। आय् आदेश होकर इ+आय्+अ बना। अब प्रथम इवर्ण के स्थान पर अभ्यासस्यासवर्णे से इयङ् होकर इय्+आय्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर इयाय सिद्ध हुआ।