Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 579
यण्विधायकं विधिसूत्रम्
इणो यण्
Aṣṭādhyāyī 6.4.81
Vṛtti Varadarājācārya

इण् गतौ॥१८॥ एति। इतः।

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अजादौ प्रत्यये परे। यन्ति।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

इण् गतौ। इण्-धातु गति अर्थ में है। णकार की इत्संज्ञा होती है, इ वचना है। णकार लगाने का प्रयोजन यह है कि इणो यण्, इणो गा लुङि इत्यादि सूत्रों में केवल इसी धातु का ग्रहण हो, इङ् आदि का ग्रहण न हो।

एति। इ से लट्, तिप्, शप्, उसका लुक् करके इ+ति बना। सार्वधातुकार्धधातुकयोः से इकार को गुण होकर एति सिद्ध हुआ। द्विवचन में इ+तस्, रुत्वविसर्ग करके इतः सिद्ध होता है।

५७९- इणो यण्। इणः षष्ठ्यन्तं, यण् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अङ्गस्य का अधिकार है और अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङ्कुवङौ से अचि की अनुवृत्ति आती है।

अजादि प्रत्यय के परे होने पर इण् धातु को यण् आदेश होता है।

यन्ति। बहुवचन में इ+अन्ति है। इको यणचि से यण् प्राप्त है, उसे बाधकर अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङ्कुवङौ से इयङ् आदेश प्राप्त है, उसे भी बाधकर इणो यण् से इकार के स्थान पर यण् हुआ अर्थात् इकार के स्थान पर यकार आदेश हुआ, य्+अन्ति बना। वर्णसम्मेलन होकर यन्ति सिद्ध हुआ।

लट्- एति, इतः, यन्ति, एषि, इथः, इथ, एमि, इवः, इमः।