घोरस्तेश्च एत्वं स्याद्धौ परेऽभ्यासलोपश्च। एत्वस्यासिद्धत्वाद्धेर्धिः।
स्नसोरित्यल्लोपः। तातङ्पक्षे एत्वं न, परेण तातङ्ग बाधात्।
एधि-स्तात्। स्तम्। स्त। असानि। असाव। असाम। आसीत्
आस्ताम्। आसन्। स्यात्। स्याताम्। स्युः। भूयात्। अभूत्। अभविष्यत्।
५७८- घ्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च। घुश्च अस् च तयोरितरेतरद्वन्द्वो घ्वसौ, तयोर्घ्वसोः। घ्वसोः
षष्ठ्यन्तम्, एत् प्रथमान्तम्, हौ सप्तम्यन्तम्, अभ्यासलोपः प्रथमान्तं, च अव्ययपदम्, अनेकपदमिदं
सूत्रम्।
हि के परे होने पर घुसंज्ञक धातु और अस् धातु के स्थान पर एकार आदेश
होता है यदि अभ्यास हो तो उसका लोप भी हो जाता है।
यह सूत्र दो काम करता है- पहला यह कि हि के परे होने पर घुसंज्ञक धातु और
अस् धातु के स्थान पर एकार आदेश तथा दूसरा यदि अभ्यास हो तो उसका लोप भी होता
है। इस सूत्र के द्वारा किये गये एत्व को हुझल्भ्यो हेर्धिः की दृष्टि में असिद्ध माना जाता
है। यदि यह सिद्ध होता तो धि करने के लिए झलन्त नहीं मिलता और धि आदेश ही नहीं
हो पाता। दा-रूप और धा-रूप धातुओं की दाधाघ्वदाप् से घुसंज्ञा होती है।
एधि। अस् धातु से लोट् लकार के मध्यमपुरुष का एकवचन सिप् आया, अस्
सि, शप्, उसका लुक्, सेहीपिच्च से सि के स्थान पर हि आदेश, अस् हि बना।
घ्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च से अस् के स्थान पर एकार आदेश होकर ए हि बना। एत्व को
असिद्ध मानकर हुझल्भ्यो हेर्धिः से हि के स्थान पर धि आदेश हो जाता है। इस तरह एधि
सिद्ध हो जाता है। एक पक्ष में हि के स्थान पर तातङ् आदेश होता ही है। उस पक्ष में
श्नसोरल्लोपः से अकार का लोप भी होगा और स्तात् यह रूप बनेगा।
उत्तमपुरुष में अस् मि, अस् नि, आडुत्तमस्य पिच्च से आट् आगम होकर अस्
आनि, वर्णसम्मेलन होकर असानि बनता है। इसी तरह वस् मस् में भी आट् आगम होता
है। इस तरह अस् धातु के लोट् लकार में निम्नलिखित रूप सिद्ध होते हैं- अस्तु-स्तात्,
स्ताम्, सन्तु। एधि-स्तात्, स्तम्, स्त। असानि, असाव, असाम।
आसीत्। अस् धातु से लङ्, आडजादीनाम् से आट् आगम, तिप्, शप्, उसका
लुक्, आ+अस्+ति, आ+अस्+त् में अस्तिसिचोऽपृक्ते से अपृक्त तकार को ईट् आगम
हुआ और टित् होने के कारण उसके आदि में बैठा। आ+अस्+ईत् बना। आ+अस् में
आटश्च से वृद्धि हुई, आस्+ईत् हुआ, वर्णसम्मेलन होने पर आसीत् सिद्ध हुआ। यह ईट्
केवल तिप् और सिप् में ही होता है, क्योंकि एक अल् अपृक्त प्रत्यय तिप्, सिप् में ही मिल
पाता है। द्विवचन में तस् के स्थान पर ताम् आदेश होने पर आस्ताम् बनता है। बहुवचन में झि के झकार के स्थान पर अन्त् आदेश और इकार का लोप करके संयोगान्तलोप करने पर अन् शेष रहता है और आ+अस्+अन् से आसन् बना लेना आसान ही है। सिप् में ईट् का आगम करना भी आप नहीं छोड़ेंगे। इस तरह अस् धातु के लङ् में रूप बनते हैं- आसीत्, आस्ताम्, आसन्। आसीः, आस्तम्, आस्त। आसम्, आस्व, आस्म।
विधिलिङ् में यासुट् आगम होता है और उसे डिद्वद्भाव भी किया जाता है। तीनों पुरुष और तीनों वचनों में यासुट् के डित् होने से शनसोरल्लोपः से अस् से अकार का लोप होकर धातु का केवल स् शेष रहता है जिससे निम्नलिखित रूप सिद्ध होते हैं- स्यात्, स्याताम्, स्युः। स्याः, स्यातम्, स्यात। स्याम्, स्याव, स्याम।
आशीर्लिङ् में लिङ् लकार की लिङ्गशिषि से आर्धधातुकसंज्ञा की जाती है और अस्तेर्भूः से अस् धातु के स्थान पर भू आदेश हो जाता है जिससे भ्वादिगणीय भू धातु के समान रूप सिद्ध हो जाते हैं। भूयात्, भूयास्ताम्, भूयासुः। भूयाः, भूयास्तम्, भूयास्त। भूयासम्, भूयास्व, भूयास्म।
लृङ्- लकार में सिच् की आर्धधातुकसंज्ञा होती है। अतः आर्धधातुक की विवक्षा में पूर्ववत् भू आदेश होता है। अब भ्वादिगणीय भू धातु की तरह सिच् का लुक् आदि करके रूप बनते हैं- अभूत्, अभूताम्, अभूवन्। अभूः, अभूतम्, अभूत। अभूवम्, अभूव, अभूम।
लृङ् लकार में भी स्य की आर्धधातुकसंज्ञा होने के कारण अस् धातु के स्थान पर भू आदेश करके शुद्ध भू धातु की तरह रूप बनते हैं- अभविष्यत्, अभविष्यताम्, अभविष्यन्। अभविष्यः, अभविष्यतम्, अभविष्यत। अभविष्यम्, अभविष्याव, अभविष्याम।