आर्धधातुके। बभूव। भविता। भविष्यति। अस्तु-स्तात्। स्ताम्, सन्तु।
५७७- अस्तेर्भूः। अस्तेः षष्ठ्यन्तं, भूः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में आर्धधातुके इसका अधिकार आ रहा है।
आर्धधातुक की विवक्षा होने पर अस् धातु के स्थान पर भू आदेश होता है।
बभूव। अस् धातु से लिट्, तिप्, णल्, अ, अस्+अ बना। अस्तेर्भूः से अस् के स्थान पर भू आदेश करने पर भू+अ बना। अब जैसे भ्वादिप्रकरण के लिट् लकार में प्रक्रिया हुई, उसी प्रकार से बभूव आदि बनाइये। बभूव, बभूवतुः, बभूवुः। बभूविथ, बभूवथुः, बभूव। बभूव, बभूविव, बभूविम।
लृट् लकार में तासि आर्धधातुकसंज्ञक है। अतः आर्धधातुक की विवक्षा में अस्तेर्भूः से भू आदेश होकर भ्वादिगणीय प्रक्रिया के अनुसार ही रूप हो जाते हैं। भविता, भवितारौ, भवितारः। भवितासि, भवितास्थः, भवितास्थ। भवितास्मि, भवितास्वः, भवितास्मः।
लृट् में भी भू आदेश करके बनाइये- भविष्यति, भविष्यतः, भविष्यन्ति। भविष्यसि, भविष्यथः, भविष्यथ। भविष्यामि, भविष्यावः, भविष्यामः।
अस्तु-स्तात्। अस् धातु से लोट्, शप्, उसका लोप, एरुः से उत्व करके
अस्तु, तु के स्थान पर वैकल्पिक तातङ् आदेश करके तात् को ङित् मानकर
श्नसोरल्लोपः से अस् के अकार का लोप करने पर स्तात् बन जाता है, आदेशाभाव
में अस्तु ही रहता है। स्ताम् और सन्तु में भी अकार का लोप होता है।