उपसर्गेण प्रादुसश्चास्तेः सस्य षो यकारेऽचि परे।
निष्यात्। प्रनिषन्ति। प्रादुःषन्ति। यच्यरः किम्? अभिस्तः।
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५७६- उपसर्गप्रादुर्भ्यामस्तिर्यच्यरः। उपसर्गश्च प्रादुष् च उपसर्गप्रादुषौ। य् च अच् च तौ
यचौ, तौ परौ यस्मात् स यच्परः, द्वन्द्वगर्भो बहुव्रीहिः। उपसर्गप्रादुर्भ्याम् पञ्चम्यन्तम्, अस्तिः प्रथमान्तं, यच्परः प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। सहेः साडः सः से सः और अपदान्तस्य मूर्धन्यः से मूर्धन्यः की अनुवृत्ति आती है। इण्कोः का अधिकार है किन्तु इण् का यहाँ पर उपयोग है और कोः का नहीं है। अतः सूत्र का अर्थ बनता है-
उपसर्गस्थ इण् से परे या प्रादुस् इस अव्यय से परे अस् धातु के सकार के स्थान पर मूर्धन्य षकार आदेश होता है यकार और अच् के परे होने पर।
जिस सकार के स्थान पर षकार हो रहा है उससे परे या तो यकार होना चाहिए या अच्।
निष्यात्। प्रनिषन्ति। नि-उपसर्ग से अस् धातु के विधिलिङ् का स्यात् परे है। उपसर्गस्थ इण् नि का इकार है, उससे परे अस् का सकार है और उस सकार से यकार परे मिलता है। अतः उपसर्गप्रादुर्भ्यामस्तिर्यच्परः से षकार आदेश हुआ- निष्यात् सिद्ध हुआ। प्रनि+सन्ति में सकार से अच् परे सकारोत्तरवर्ती अकार मिलता है। अतः षत्व होकर प्रनिषन्ति बना।
प्रादुःषन्ति। प्रादुस् इस अव्यय से परे सन्ति के सकार को षत्व होकर प्रादुस् के सकार को रुत्व और विसर्ग होने पर प्रादुःषन्ति सिद्ध होता है।
यच्परः किम्? अभिस्तः। यदि सूत्र में यच्परः अर्थात् यकार और अच् परे ऐसा न कहते तो अभि+स्तः में सकार को षत्व हो जाता जिससे षकार से परे तकार को भी ष्टुत्व होकर अभिष्टः ऐसा अनिष्ट रूप सिद्ध हो जाता। यच्परः कहने से यहाँ पर सकार से न तो यकार परे है और न ही अच्, किन्तु तकार परे है। अतः षत्व नहीं हुआ।