अस भुवि॥१७॥ अस्ति।
श्नस्यास्तेश्चातो लोपः सार्वधातुके विङति।
स्तः। सन्ति। असि। स्थः। स्थ। अस्मि। स्वः। स्मः।
अस् भुवि। अस् धातु सत्ता, होना आदि अर्थों में है। सकारोत्तरवर्ती अकार की इत्संज्ञा होती है, अस् बचता है। उदात्तेत् होने और आत्मनेपद के निमित्तों से हीन होने के कारण यह धातु परस्मैपदी है।
अस्ति। अस् धातु से लट्, तिप्, शप्, उसका लुक्, वर्णसम्मेलन करके अस्ति बनता है।
५७५- श्नसोरल्लोपः। श्नश्च अस् च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः श्नसौ(अत्र शकन्ध्वादिपररूपम्। श्नसोः पष्ठ्यन्तम्, अल्लोपः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अत उत्सार्वधातुके से सार्वधातुके और गमहनजनखनघसां लोपः विङत्यनङि से विङति की अनुवृत्ति आती है।
श्नम् के अकार और अस् धातु के अकार का लोप होता है सार्वधातुक कित्, ङित् परे रहते।
तिप्, सिप्, मिप् में पित् होने के कारण सार्वधातुकमपित् से ङित् नहीं हो पाता है, अतः अल्लोप नहीं होता है। शेष में ङिद्वद्भाव हो जाने के कारण अकार का लोप हो जाता है।
स्तः। सन्ति। अस् से प्रथमपुरुष का द्विवचन तस्, अस्+तस् बना। शप्, उसका लुक् करके सार्वधातुकमपित् से ङिद्वद्भाव करके श्नसोरल्लोपः से अस् के अकार का लोप हुआ, स्+तस् बना, वर्णसम्मेलन हुआ, स्तस् बना, सकार को रुत्व और विसर्ग हुआ- स्तः बना। झि में श्नसोरल्लोपः से अकार का लोप होकर स्+अन्ति, वर्णसम्मेलन होकर सन्ति।
इस प्रकार से अस् धातु के लट्-लकार में रूप बनते हैं- अस्ति, स्तः, सन्ति। असि, स्थः, स्थ। अस्मि, स्वः, स्मः।