धातोर्दस्य पदान्तस्य सिपि रुर्वा। अवेः, अवेत्। विद्यात्। विद्याताम्।
विद्युः। विद्यात्। विद्यास्ताम्। अवेदीत्। अवेदीष्यत्।
५७४- दशच। दः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। सिपि धातो रुर्वा यह पूरा सूत्र अनुवर्तित होता है। पदस्य का अधिकार है।
सिप् के परे होने पर धातु के पदान्त दकार के स्थान पर विकल्प से रु आदेश होता है।
लङ् में अवेत्, अवित्ताम्, अविदुः, इन तीन प्रयोगों की प्रक्रिया सरल ही है। सिप् में अविदु+स् है। पुगन्तलघूपधस्य च से लघूपधगुण होकर सकार का संयोगान्तलोप होता है और दकार के स्थान पर दशच से वैकल्पिक रुत्व करके उसके स्थान पर विसर्ग आदेश करने पर अवेः बन जाता है। रुत्व न होने के पक्ष में दकार को वावसाने से
वैकल्पिक चर्त्व होकर अवेत् और अवेद् ये दो रूप सिद्ध होते हैं। इस तरह सिप् में तीन रूप बन गये। शेष रूप- अवित्तम्, अवित्त, अवेदम्, अविद्व, अविद्वा।
विधिलिङ्- विद्यात्, विद्याताम्, विद्युः, विद्याः, विद्यातम्, विद्यात, विद्याम्, विद्याव, विद्याम। आशीर्लिङ्- विद्याद्, विद्यास्ताम्, विद्यासुः आदि। लृङ्- अवेदीत्, अवेदिष्टाम्, अवेदिषुः, अवेदीः, अवेदिष्टम्, अवेदिष्ट, अवेदिषम्, अवेदिष्व, अवेदिष्म। लृङ्- अवेदिष्यत्, अवेदिष्यताम्, अवेदिष्यन् आदि।