वेत्तेर्लोटि आम् गुणाभावो लोटो लुक् लोडन्तकरोत्यनुप्रयोगश्च वा
निपात्यते, पुरुषवचने न विवक्षिते।
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५७१- विदाङ्कुर्वन्त्वित्यन्यतरस्याम्। विदाङ्कुर्वन्तु क्रियापदम्, इति अव्ययपदम्, अन्यतरस्याम् सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।
लोट् लकार के परे होने पर विद् धातु से आम् प्रत्यय, उसके परे होने पर लघूपधगुण का अभाव, लोट् का लुक् और लोडन्त कृ-धातु का अनुप्रयोग ये सब कार्य विकल्प से होते हैं।
यह निपातन करने वाला सूत्र है। सूत्र में विदाङ्कुर्वन्तु यह सिद्ध रूप दिखाया गया है। इस रूप की सिद्धि में जो जो भी प्रक्रिया अपेक्षित हो, वह-वह कर लेनी चाहिए अर्थात् विद् धातु से विदाङ्कुर्वन्तु बनाने में जो जो कार्य अपेक्षित है, जो जो आगम, आदेश, किसी प्रक्रिया का अभाव आदि करने में स्वतन्त्र हैं। जैसे विद्+ति में आम् किया गया और आम् के परे होने पर लघूपधगुण प्राप्त होता है, उसका अभाव अर्थात् गुण को रोका गया और आम् से लोट् को साथ लेकर कृ का अनुप्रयोग किया गया। इस तरह कमोबेस आम्प्रकृतिक धातु से लिट् लकार में बनने वाले रूपों की तरह प्रक्रिया की गई, किन्तु लोट् लकार होने के कारण द्वित्व आदि नहीं हुए। उत्व आदि तो उत्सर्गतः प्राप्त हैं ही। इस निपातन और अग्रिम सूत्र की प्रवृत्ति के बाद विदाङ्करोतु सिद्ध होगा। इस निपातन में पुरुष और वचन की विवक्षा नहीं की गई है अर्थात् लोट् लकार के तीनों पुरुष और सभी वचनों में यह निपातन होगा।