Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 572
उप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
तनादिकृञ्भ्य उः
Aṣṭādhyāyī 3.1.79
Vṛtti Varadarājācārya

तनादेः कृञ्श्च उः प्रत्ययः स्यात्। शपोऽपवादः। गुणौ। विदाङ्करोतु।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५७२- तनादिकृञ्भ्य उः। तन् आदि येषां ते तनादयः, तनादयश्च कृञ् च तेषामितरेतरद्वन्द्वः तनादिकृञः, तेभ्यः तनादिकृञ्भ्यः। तनादिकृञ्भ्यः पञ्चम्यन्तम्, उः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में कर्तरि शप् से कर्तरि और सार्वधातुके गक् से सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है।

कर्त्रर्थक सार्वधातुक के परे होने पर तनादिगणीय धातु और कृ धातु से उ प्रत्यय होता है।

यह सूत्र शप् का अपवाद है। उ भी एक विकरण है।

विदाङ्करोतु। विद् धातु से लोट्, तिप्, शप्, उसका लुक् करके विदाङ्कुर्वन्त्वित्यन्यतरस्याम् से आम्, लघूपध गुण का अभाव, लोट् का लुक्, लोट् को पर लेकर कृ का अनुप्रयोग आदि निपातित होकर विदाम्+कृति बना। कृ से ति के परे रहते कर्तरि शप् से शप् प्राप्त था, उसे बाधकर तनादिकृञ्भ्य उः से उ प्रत्यय हुआ, विदाम्+कृ+उ+ति बना। उ की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा हुई और उसके परे होने पर सार्वधातुकार्धधातुकयोः से कृ के ऋकार को गुण हुआ। उरण् रपरः की सहायता से रपर होकर अर् हुआ। विदाम्+कर्+उति बना। उ को भी गुण होकर ओकार और ति के इकार को एरुः से उकार होकर विदाम्+करोतु बना। विदाम् में मकार को मोऽनुस्वारः से अनुस्वार और उसको वा पदान्तस्य से परसवर्ण होकर विदाङ्करोतु यह रूप सिद्ध होता

है। तु होने के बाद तुह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम् से तातङ् आदेश होकर विदाङ्कुरुतात् बनता है जिसके लिए अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है।