Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 570
आम्बिधायकं विधिसूत्रम्
उषविदजागृभ्योऽन्यतरस्याम्
Aṣṭādhyāyī 3.1.38
Vṛtti Varadarājācārya

एभ्यो लिटि आम् वा स्यात्। विदेरदन्तत्वप्रतिज्ञानादामि न गुणः।

विदाञ्चकार, विवेद। वेदिता। वेदिष्यति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५७०- उषविदजागृभ्योऽन्यतरस्याम्। उषश्च विदश्च जागा च तेषामितरेतरद्वन्द्व उषविदजागारः, तेभ्य उषविदजागृभ्यः। उषविदजागृभ्यः पञ्चम्यन्तम्, अन्यतरस्याम् सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। कास्प्रत्ययादाममन्त्रे लिटि से आम् और लिटि की अनुवृत्ति आती है।

उष, विद् और जागृ धातुओं से परे विकल्प से आम् होता है लिट् परे होने पर।

आम् के सन्नियोग में विद् धातु को अदन्त विद् ऐसा निपातन किया गया है, अतः आम् के परे होने पर यह धातु अदन्त ही रहता है।

विदाञ्चकार। विद् धातु से लिट्, उसके परे होने पर उषविदजागृभ्योऽन्यतरस्याम् से आम् और विद् को विद् के रूप में निपातन आदि करके विद्+आम्+लिट् बना। विद् को हलन्त समझकर आम् को आर्धधातुक मानकर के पुगन्तलघूपधस्य च से विद् में उपधागुण प्राप्त हो सकता था किन्तु आम्बिधायक सूत्र में विद् को विद् के रूप में अदन्तत्व निपातन होने के कारण गुण नहीं हुआ अपितु अतो लोपः से लोप हुआ। विद्+आम् में वर्णसम्मेलन होकर विदाम् से परे लिट् का आमः से लुक् हुआ। कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि से लिट् को पर लेकर कृ, भू, अस् का बारी-बारी से अनुप्रयोग हुआ। कृ के पक्ष में गोपायाञ्चकार की तरह विदाञ्चकार बन जाता है।

कृ-धातु के अनुप्रयोग होने पर- विदाञ्चकार, विदाञ्चक्रतुः, विदाञ्चक्रुः, विदाञ्चकर्थ, विदाञ्चक्रथुः, विदाञ्चक्र, विदाञ्चकार-विदाञ्चकर, विदाञ्चकृव, विदाञ्चकृम। भू-धातु का अनुप्रयोग होने पर- विदाम्बभूव, विदाम्बभूवतुः आदि। अस्-धातु का अनुप्रयोग होने पर- विदामास, विदामासतुः आदि। आम् न होने के पक्ष में- विवेद, विविदतुः आदि।

लुट्- वेदिता, वेदितारौ, वेदितारः आदि। लृट्- वेदिष्यति, वेदिष्यतः, वेदिष्यन्ति।