वेत्तेर्लटः परस्मैपदानां गलादयो वा स्युः। वेद। विदतुः। विदुः। वेत्थ।
विदथुः। विद। वेद। विद्व। विद्म। पक्षे- वेत्ति। वित्तः। विदन्ति।
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विद ज्ञाने। विद-धातु जानना अर्थ में है। उदात्त अकार की इत्संज्ञा होती है, विद् शेष रहता है। इसी धातु से कृत्प्रकरण में विद्वान्, विद्या, वेद आदि शब्द बनते हैं।
५६९- विदो लटो वा। विदः पञ्चम्यन्तं, लटः पष्ठ्यन्तं, वा अव्ययं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।
विद् धातु से परे लट् के परस्मैपद के स्थान पर गल् आदि नौ प्रत्यय विकल्प से होते हैं।
अभी तक लिट् लकार के परस्मैपद प्रत्ययों के स्थान पर ही गल्, अतुस्, उस् आदि आदेश होते आये हैं। यहाँ केवल विद् धातु से लट् लकार में भी ये आदेश हो रहे हैं। द्वित्व आदि तो नहीं होते हैं।
वेद। विद् से लट्, तिप्, उसके स्थान पर गल् आदेश करके, शप्, उसका लुक् करके विद्+अ बना। पुगन्तलघूपधस्य च से गुण होकर वेद+अ, वर्णसम्मेलन होकर वेद सिद्ध हुआ। सार्वधातुकमपित् से डिद्धद्भाव होने से अपित् में गुण नहीं होता। सिप् के स्थान पर थल् होकर विद्+थ हुआ। गुण होकर वेद+थ बना। खरि च से चर्त्व होकर तकार हुआ तो वेत्थ सिद्ध हुआ। इस तरह लट् के रूप बने- वेद, विदतुः, विदुः, वेत्थ, विदथुः, विद,
वेद, विद्व, विद्म। णल् आदि आदेश न होने के पक्ष में विद्+ति, गुण एवं चर्त्व होकर वेत्ति बनता है। आगे सिप् और मिप् में गुण, अन्यत्र गुणाभाव होकर रूप बनते हैं- वेत्ति, वित्तः, विदन्ति, वेत्सि, वित्थः, वित्थ, वेद्मि, विद्वः, विद्मः।