Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 568
वैकल्पिकजुसादेशविधायकं विधिसूत्रम्
लङः शाकटायनस्यैव
Aṣṭādhyāyī 3.4.111
Vṛtti Varadarājācārya

या प्रापणे॥४॥ याति। यातः। यान्ति। ययौ। याता। यास्यति। यातु।

अयात्। अयाताम्।

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आदन्तात्परस्य लङो झेर्जुस् वा स्यात्।

अयुः, अयान्। यायात्। यायाताम्, यायुः, यायात्, यायास्ताम्, यायासुः, अयासीत्, अयास्यत्।

वा गतिगन्धनयोः॥५॥ भा दीप्तौ॥६॥

ष्णा शौचे॥७॥ श्रा पाके॥८॥

द्रा कुत्सायां गतौ॥९॥

प्सा भक्षणे॥१०॥ रा दाने॥११॥

ला आदाने॥१२॥ दाप् लवने॥१३॥

पा रक्षणे॥१४॥ ख्या प्रकथने॥१५॥

अयं सार्वधातुक एव प्रयोक्तव्यः।

विद ज्ञाने॥१६॥

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

या प्रापणे। या धातु जाना अर्थ में है। अनिट् है। लिट् में पा धातु की प्रक्रिया का स्मरण करें जैसे कि णल् में आत और णलः से औकार आदेश और अतुस् आदि में आतो लोप इटि च से आकार लोप आदि।

लट्- याति, यातः, यान्ति, यासि, याथः, याथ, यामि, यावः, यामः।

लिट्- पा धातु की तरह- ययौ, ययतुः, ययुः, ययिथ-ययाथ, ययथु, यय, ययौ, ययिव, ययिम।

लुट्-याता, यातारौ, यातारः, यातासि, यातास्थः, यातास्थ, यातास्मि, यातास्वः, यातास्मः।

लुट्- यास्यति, यास्यतः, यास्यन्ति, यास्यसि, यास्यथः, यास्यथ, यास्यामि, यास्यावः, यास्यामः।

लोट्- यातु-यातात्, याताम्, यान्तु, याहि-यातात्, यातम्, यात, यानि, याव, याम।

५६८- लङः शाकटायनस्यैव। लङः षष्ठ्यन्तं, शाकटायनस्य षष्ठ्यन्तम्, एव अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। आतः और झेर्जुस् ये दोनों सूत्र अनुवर्तित होते हैं।

आदन्त धातु से परे लङ् के झि के स्थान पर विकल्प से जुस् आदेश होता है।

लङ् के तिप् और तस् में अयात्, अयाताम् बनते हैं। झि के स्थान पर अप्राप्त जुस् आदेश का लङः शाकटायनस्यैव से विकल्प से होकर अया+उस् बना। उस्यपदान्तात् से पररूप होकर अयुः सिद्ध हुआ। जुस् न होने के पक्ष में अन्त् आदेश होकर तकार का संयोगान्तलोप होकर अयान् बनता है। अयात्, अयाताम्, अयुः-अयान्, अयाः, अयातम्, अयात, अयाम्, अयाव, अयाम। विधिलिङ्- यायात्, यायाताम्, यायुः, यायाः, यायातम्, यायात, यायाम्, यायाव, यायाम। आशीर्लिङ्- यायात्, यायास्ताम्, यायासुः, यायाः, यायास्तम्, यायास्त, यायासम्, यायास्व, यायास्म।

लृङ् में यमरमनमातां सक् च से इट् व सक् होकर रूप बनते हैं- अयासीत्, अयासिष्टाम्, अयासिषुः, अयासीः, अयासिष्टम्, अयासिष्ट, अयासिषम्, अयासिष्व, अयासिष्म।

लृङ्- अयास्यत्, अयास्यताम्, अयास्यन् आदि।

वा गतिगन्धनयोः। वा धातु गति अर्थात् वायु का चलना और गन्धन अर्थात् सूचित करना, हिंसा, उत्साहित करना आदि अर्थ में है। इस धातु समग्र के रूप या धातु की तरह ही होते हैं। लट्- वाति, वातः, वान्ति, वासि, वाथः, वाथ, वामि, वावः, वामः। लिट्- ववौ, ववतुः, ववुः, वविथ-ववाथ, ववथुः, वव, ववौ, वविव, वविम। लुट्- वाता, वातारौ,

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वातारः आदि। लृट्- वास्यति, वास्यतः, वास्यन्ति। लोट्- वातु-वातात्, वाताम्, वान्तु, वाहि-वातात्, वातम्, वात, वानि, वाव, वाम। लङ्- अवात्, अवाताम्, अवुः। विधिलिङ्- वायात्, वायाताम्, वायुः। आशीर्लिङ्- वायात्, वायास्ताम्, वायासुः। लुङ्- अवासीत्, अवासिष्टाम्, अवासिषुः, अवासीः, अवासिष्टम्, अवासिष्ट, अवासिषम्, अवासिष्व, अवासिष्म। लृङ्- अवास्यत्, अवास्यताम्, अवास्यन् आदि।

भा दीप्तौ। भा धातु चमकना अर्थ में है। इसमें किसी वर्ण की इत्संज्ञा नहीं है अतः यह आत्मनेपदनिमित्त से हीन है। इसके रूप भी या की तरह ही चलते हैं। यहाँ पर प्रत्येक लकार से एक-एक रूप प्रदर्शित हैं, शेष स्वयं बनायें। भाति। बभौ, बभतुः, बभुः। भाता। भास्यति। भातु। अभात्। भायात्। भायात्। अभासीत्। अभास्यत्।

ष्णा शौचे। ष्णा-धातु स्नान करना अर्थ में है। धात्वादेः षः सः से पकार के स्थान पर सकार आदेश और निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः के अनुसार णकार भी नकार में आ जाता है, क्योंकि पकार के योग में ही नकार घ्युत्व होकर णकार में बदल गया था। जब निमित्त पकार ही सकार में बदल गया तो नैमित्तिक णकार को भी नकार में बदलना पड़ेगा ही। इस तरह यह धातु स्ना बन जाता है। इसके रूप भी या की तरह ही स्नाति, स्नातः, स्नान्ति आदि होते हैं किन्तु लिट् में थोड़ा ध्यान देना होगा क्योंकि यहाँ पर हलादिशेष होकर सा+स्ना+औ में अभ्यास को ह्रस्व होकर सस्नौ, सस्नतुः, सस्नुः आदि रूप बनते हैं। आशीर्लिङ् में वान्यस्य संयोगादेः से वैकल्पिक एत्व होकर दो-दो रूप बनते हैं। आगे के लकारों में- स्नाता। स्नास्यति। स्नातु। अस्नात्। स्नायात्। स्नेयात्-स्नायात्। अस्नासीत्। अस्नास्यत्।

श्रा पाके। श्रा-धातु पकना अर्थ में है। पकाना अर्थ होता तो सकर्मक होता किन्तु पकना अर्थ है, अतः अकर्मक है। इसकी सारी प्रक्रिया या की तरह ही है किन्तु आशीर्लिङ् में वान्यस्य संयोगादेः से वैकल्पिक एत्व होकर दो-दो रूप बनते हैं। श्राति, शश्रौ, श्राता, श्रास्यति, श्रातु, अश्रात्, श्रायात्, श्रेयात्-श्रायात्, अश्रासीत्, अश्रास्यत्।

प्सा भक्षणे। प्सा-धातु भक्षण करना अर्थ में है। यह भी संयोगादि धातु है, अतः आशीर्लिङ् में वैकल्पिक एत्व होता है, शेष रूप या की तरह ही होते हैं। प्साति, पप्सौ, प्साता, प्सास्यति, प्सातु, अप्सात्, प्सायात्, प्सेयात्-प्सायात्, अप्सासीत्, अप्सास्यत्।

रा दाने। रा-धातु देने अर्थ में है। इसकी भी सारी प्रक्रिया या धातु के समान ही है। लृट्- राति, रातः, रान्ति। रासि, राथः, राथ। रामि, रावः, रामः। लिट्- ररौ, ररतुः, ररुः। ररिथ-रराथ, ररथुः, रर। ररौ, ररिव, ररिम। लृट्- राता, रातारौ, रातारः। रातासि, रातास्थः, रातास्थ। रातास्मि, रातास्वः, रातास्मः। लृट्- रास्यति, रास्यतः, रास्यन्ति। रास्यसि, रास्यथः, रास्यथ। रास्यामि, रास्यावः, रास्यामः। लोट्- रातु-रातात्, राताम्, रान्तु। राहि-रातात्, रातम्, रात। राणि, राव, राम। लङ्- अरात्, अराताम्, अरुः। अराः, अरातम्, अरात। अराम्, अराव, अराम। विधिलिङ्- रायात्, रायाताम्, रायुः। रायाः, रायातम्, रायात। रायाम्, रायाव, रायाम। आशीर्लिङ्- रायात्, रायास्ताम्, रायासुः। रायाः, रायास्तम्, रायास्त। रायासम्, रायास्व, रायास्म। लुङ्- अरासीत्, अरासिष्टाम्, अरासिषुः। अरासीः, अरासिष्टम्, अरासिष्ट। अरासिषम्, अरासिष्व, अरासिष्म। लृङ्- अरास्यत्, अरास्यताम्, अरास्यन्। अरास्यः, अरास्यतम्, अरास्यत। अरास्यम्, अरास्याव, अरास्याम।

ला आदाने। ला-धातु ग्रहण करना अर्थ में है। इसकी प्रक्रिया भी या की तरह ही है। लाति, ललौ, लाता, लास्यति, लातु, अलात्, लायात्, लायात्, अलासीत्, अलास्यत्।

दाप् लवने। दाप्-धातु काटना अर्थ में है। पकार की इत्संज्ञा होती है, दा मात्र अवशिष्ट है। इसके रूप भी या की तरह ही हैं। दाति, ददौ, दाता, दास्यति, दातु, अदात्, दायात्, दायात्, अदासीत्, अदास्यत्।

पा रक्षणे। पा-धातु रक्षा करना अर्थ में है। इसकी भी प्रक्रिया या धातु के समान ही है। लट्- पाति, पातः, पान्ति। पासि, पाथः, पाथ। पामि, पावः, पामः। लिट्- पपौ, पपतुः, पपुः। पपिथ-पपाथ, पपथुः, पप। पपौ, पपिव, पपिम। लृट्- पाता, पातारौ, पातारः। पातासि, पातास्थः, पातास्थ। पातास्मि, पातास्वः, पातास्मः। लृट्- पास्यति, पास्यतः, पास्यन्ति। पास्यसि, पास्यथः, पास्यथ। पास्यामि। पास्यावः, पास्यामः। लोट्- पातु-पातात्, पाताम्, पान्तु। पाहि-पातात्, पातम्, पात। पानि, पाव, पाम। लङ्- अपात्, अपाताम्, अपुः। अपाः, अपातम्, अपात। अपाम्, अपाव, अपाम। विधिलिङ्- पायात्, पायाताम्, पायुः। पायाः, पायातम्, पायात। पायाम्, पायाव, पायाम। आशीर्लिङ्- पायात्, पायास्ताम्, पायासुः। पायाः, पायास्तम्, पायास्त। पायासम्, पायास्व, पायास्म। लुङ्- अपासीत्, अपासिष्टाम्, अपासिपुः। अपासीः, अपासिष्टम्, अपासिष्ट, अपासिषम्, अपासिष्व, अपासिष्म। लृङ्- अपास्यत्, अपास्यताम्, अपास्यन्। अपास्यः, अपास्यतम्, अपास्यत। अपास्यम्, अपास्याव, अपास्याम।

ख्या प्रकथने। ख्या-धातु कहना अर्थ में है। इस धातु का प्रयोग सार्वधातुक में ही होता है अर्थात् लट्, लोट्, लङ् और विधिलिङ् में ही इसके रूप होते हैं, लिट् आदि आर्धधातुकों में नहीं। लट्- ख्याति, ख्यातः, ख्यान्ति। लोट्- ख्यातु-ख्यातात्, ख्याताम्, ख्यान्तु। लङ्- अख्यात्, अख्याताम्, अख्युः। विधिलिङ्- ख्यायात्, ख्यायाताम्, ख्यायुः।