यु मिश्रणामिश्रणयोः॥३॥
लुग्विषये उतो वृद्धिः पिति हलादौ सार्वधातुके नत्वभ्यस्तस्य।
यौति। युतः। युवन्ति। यौषि। युथः। युथ। यौमि। युवः। युमः। युयाव।
यविता। यविष्यति। यौतु, युतात्। अयौत्। अयुताम्। अयुवन्। युयात्। इह
उतो वृद्धिर्न, भाष्ये- पिच्च डिन्न, डिच्च पिन्न इति व्याख्यानात्।
युयाताम्। युयुः। यूयात्। यूयास्ताम्। यूयासुः। अयावीत्। अयविष्यत्।
यु मिश्रणामिश्रणयोः। यु धातु मिलाना और अलग करना दोनों अर्थों में है। उद्ददन्तैः..... इस कारिका के अनुसार यह धातु सेट् है।
५६७- उतो वृद्धिर्लुकि हलि। उतः षष्ठ्यन्तं, वृद्धिः प्रथमान्तं, लुकि सप्तम्यन्तं, हलि सप्तम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। अङ्गस्य का अधिकार है। नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके से न, अभ्यस्तस्य, पिति और सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है।
लुक् के विषय में अभ्यस्त से भिन्न उदन्त अङ्ग को वृद्धि होती है हलादि पित् सार्वधातुक परे हो तो।
लट्, लोट्, लङ् और विधिलिङ् में तिप्, सिप् और मिप् के परे रहते पूर्व को वृद्धि हो जाती है।
यौति। यु से लट्, तिप्, शप्, उसका लुक् करके यु+ति बना। ति पित् सार्वधातुक है, अतः उतो वृद्धिर्लुकि हलि से वृद्धि होकर यौ+ति=यौति सिद्ध हुआ। इसी तरह यौषि, यौमि भी सिद्ध होते हैं। शेष में पित् न होने के कारण वृद्धि नहीं होती। अन्ति के परे होने पर अजादि परे मिलता है, अतः अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ से उवङ् होकर युवन्ति बनता है। इस तरह लट् में रूप बनते हैं- यौति, युतः, युवन्ति, यौषि, युथः, युथ, यौमि, युवः, युमः।
लिट् के तिप् में युयु+अ है, अचो ज्याति से वृद्धि होकर युयौ+अ बना। आव् आदेश होकर युयाव सिद्ध हुआ। अपित् में इयङ् आदेश होता है। युयाव, युयुवतुः, युयुवुः। युयविथ, युयुवथुः, युयुव। युयाव-युयव, युयुविव, युयुविम।
लुट्- यविता, यवितारौ, यवितार।, यवितासि, यवितास्थः। यवितास्थ, यवितास्मि, यवितास्वः, यवितास्मः। लृट्- यविष्यति, यविष्यतः, यविष्यन्ति। यविष्यसि, यविष्यथः, यविष्यथ। यविष्यामि, यविष्यावः, यविष्यामः। लोट्- यौतु-युतात्, युताम्, युवन्तु। युहि-युतात्, युतम्, युत। यवानि, यवाव, यवाम। लङ्- अयौत्, अयुताम्, अयुवन्। अयौः, अयुतम्, अयुत। अयवम्, अयुव, अयुम।
विधिलिङ् में यु+यास्+त् है। तिप् पित् है और उसको यासुट् आगम हुआ है, वह यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो डिन्च्य से डित् है किन्तु ति में विद्यमान पित्व उसके आगम यासुट् में भी आ जाता है। यदागमास्तद्गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते। अतः यास् को पित् मानकर उतो वृद्धिर्लुकि हलि से वृद्धि हो जानी चाहिए। इसके समाधान के लिए महाभाष्यकार ने किसी दूसरे उपाय से वृद्धि को रोका है। उनका कहना है कि डिन्च्य पित्र, पिच्च्य डिन्न अर्थात् जो डित् होता है वह पित् नहीं होता और जो पित् होता है वह डित् नहीं होता। यासुट् डित् है, अतः उसमें पित्व नहीं आ सकता। पित्वाभावात् वृद्धि भी नहीं होती। अतः युयात् ही रह जाता है।
युयात्, युयाताम, युयुः। युयाः, युयातम्, युयात। युयाम्, युयाव, युयाम।
आशीर्लिङ् में सार्वधातुक न होने से वृद्धि नहीं होती है किन्तु अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से दीर्घ होकर यूयात्, यूयास्ताम्, यूयासुः। यूयाः, यूयास्तम्, यूयास्त। यूयासम्, यूयास्व, यूयास्म रूप बनते हैं।
लृङ् में यु से तिप्, अट्, सिच्, इट्, ईट् होने पर अयु+इस्+ईत् बना है। सिच्चि वृद्धिः परस्मैपदेषु से वृद्धि होकर अयौ, सकार का इट ईटि से लोप करके सवर्णदीर्घ,
अयौ+ईत् बना। आव् आदेश होकर अयावीत् सिद्ध हुआ। अयावीत्, अयाविष्टाम्, अयाविषुः, अयावीः, अयाविष्टम्, अयाविष्ट, अयाविषम्, अयाविष्व, अयाविष्म।
लृङ्- अयविष्यत्, अयविष्यताम्, अयविष्यन् इत्यादि।