Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 566
स्थानिवद्भावविधायकमतिदेशसूत्रम्
अचः परस्मिन् पूर्वविधौ
Aṣṭādhyāyī 1.1.57
Vṛtti Varadarājācārya

परनिमित्तोऽजादेशः स्थानिवत्, स्थानिभूतादचः पूर्वत्वेन दृष्टस्य विधौ कर्तव्ये।

इत्यल्लोपस्य स्थानिवत्तात्र वृद्धिः। अवधीत्। अहनिष्यत्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५६६- अचः परस्मिन् पूर्वविधौ। अचः षष्ठ्यन्तं, परस्मिन् सप्तम्यन्तं, पूर्वविधौ सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ से स्थानिवत् और आदेशः की अनुवृत्ति आती है।

पर को निमित्त मानकर हुआ अजादेश स्थानिवत् होता है, यदि उस स्थानिभूत अच् से पूर्व देखे गये के स्थान पर कोई कार्य करना हो तो।

अच् के स्थान पर हुए आदेश को अजादेश कहा जाता है। स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ से अनल्विधि में और इससे अल्विधि में स्थानिवद्भाव होता है। ध्यान रहे कि यह सूत्र आदेश के पहले जो अच् के रूप में स्थानी थी, उससे पूर्व की किसी विधि के करने में ही करता है।

अवधीत्। लुङ् लकार की विवक्षा में लुङि च से वध आदेश करके लुङ्, अट्, तिप्, इकार का लोप, च्लि, सिच्। यद्यपि हन् धातु एकाच् होने के कारण अनिट् है फिरभी वध आदेश के अनेकाच् होने के कारण सेट् हो जाता है। अतः वलादि आर्धधातुक को इट् होगा। अस्तिसिचोऽपृक्ते से ईट् होकर अवध+इस्+ईत् बना। अतो लोपः से अवध में ध कारोत्तरवर्ती अकार का लोप होने के बाद हलन्त धातु मानकर अतो हलादेर्लघोः से वकारोत्तरवर्ती अकार को वैकल्पिक वृद्धि प्राप्त थी। ऐसी स्थिति में अचः परस्मिन् पूर्वविधौ से स्थानिवद्भाव हो जाता है अर्थात् अकार के लोप का स्थानिवद्भाव होकर अदन्त जैसा दीखता है। यहाँ पर स्थानिभूत अच् है वध का अ। उस अकार से पूर्व को वृद्धि प्राप्त है। स्थानिवद्भावेन धातु और सिच् के बीच में अकार दीखने के कारण वृद्धि नहीं हुई। इट ईटि से सकार का लोप, सवर्णदीर्घ, वर्णसम्मेलन होकर अवधीत् सिद्ध हुआ।

लृङ्- अवधीत्, अवधिष्टाम्, अवधिपुः, अवधीः, अवधिष्टम्, अवधिष्ट, अवधिषम्, अवधिष्व, अवधिष्म। लृङ्- अहनिष्यत्, अहनिष्यताम्, अहनिष्यन् आदि।