Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 565
लुङि च
Aṣṭādhyāyī 2.4.43
Vṛtti Varadarājācārya

वधादेशोऽदन्तः। आर्धधातुके इति विषयसप्तमी, तेन आर्धधातुकोपदेशे अकारान्तत्वादतो लोपः। वध्यात्। वध्यास्ताम्। आदेशस्यानेकाच्चादेकाच इतीणिनषेधाभावादिट्। अतो हलादेः इति वृद्धौ प्राप्तायाम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५६५- लुङि च। लुङि सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। आर्धधातुके का अधिकार है ही, हन वध लिङि से हन और वध की अनुवृत्ति आती है।

हन् धातु के स्थान पर वध आदेश होता है आर्धधातुक लुङ् की विवक्षा में।

वध आदेश अदन्त है अर्थात् धकारोत्तरवर्ती अकार की इत्संज्ञा नहीं होती है। अतः आर्धधातुकोपदेश में यह धातुरूप आदेश अदन्त है, फलतः अतो लोपः से अकार का लोप हो जाता है।

अनेक आचार्य इन दोनों सूत्रों का सम्मिलित अर्थ करते हैं- हन् धातु के स्थान पर वध आदेश होता है, आर्धधातुक लिङ् और लुङ् की विवक्षा होने पर।

वध्यात्। हन् से आशीर्लिङ् की विवक्षा में हनो वध लिङि से वध आदेश होने

के बाद लिङ्, ति, यासुट्, अनुबन्धलोप वध+यास्+त् बना। उसके बाद अतो लोपः से अकार का और स्कोः संयोगाद्योः से सकार का लोप होकर वध्यात् सिद्ध होता है। वध्यात्, वध्यास्ताम्, वध्यासुः, वध्याः, वध्यास्तम्, वध्यास्त, वध्यासम्, वध्यास्व, वध्यास्म।