वच्यादीनां ग्रह्यादीनां चाभ्यासस्य सम्प्रसारणं लिटि। इयाज।
५४६- लिट्यभ्यासस्योभयेषाम्। लिटि सप्तम्यन्तम्, अभ्यासस्य षष्ठ्यन्तम्, उभयेषां षष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। ष्यङः सम्प्रसारणम् से सम्प्रसारणम् की अनुवृत्ति आती है। अष्टाध्यायी के क्रम में पूर्वसूत्र वचिस्वपियजादीनां किति में वर्णित वच्यादि और ग्रहिन्यावयिव्यधि-वष्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां ङिति च में वर्णित ग्रह्यादि, दो धातु-समूहों का ग्रहण यहाँ पर उभयेषाम् इस पद के द्वारा किया गया है।
लिट् के परे रहने पर वच् आदि धातुओं और ग्रह् आदि धातुओं के अभ्यास को सम्प्रसारण होता है।
वच्यादिगण में वच्, स्वप्, यज्, वप्, वह्, वस्, वेज्, व्येज्, ह्वेज्, वद् और शिव ये ग्यारह धातुएँ हैं तो ग्रह्यादिगण में ग्रह्, ज्या, वय्, व्यध्, वश्, व्यच्, व्रश्च्, प्रच्छ् और भ्रस्ज् ये नौ धातुएँ हैं। स्मरण होगा ही कि सम्प्रसारण का तात्पर्य यण् के स्थान पर इक् का होना है। यज् धातु में यकार है, उसका सम्प्रसारण इकार होता है।
इयाज। यज् से लिट्, तिप्, णल्, अनुबन्धलोप होकर; द्वित्व, हलादिशेष करके ययज्+अ बना है। लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् से अभ्यास य्+अ में यकार को सम्प्रसारण होने पर इ्+अ बना। इ्+अ में सम्प्रसारणाच्च से पूर्वरूप होकर इ मात्र बना। आगे यज्+अ है। यज् में अकार को अत उपधायाः से वृद्धि होकर इ्+याज्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर इयाज सिद्ध हुआ।