सिचो लोपो झलि। अभृत। अभृषाताम्। अभरिष्यत्, अभरिष्यत।
हृञ् हरणे॥३॥
हरति, हरते। जहार। जहर्थ। जहिव। जहिम। जहे।
जहिषे। हर्तासि, हर्तासे। हरिष्यति, हरिष्यते। हरतु, हरताम्। अहरत्,
अहरत। हरेत्, हरेत। हियात्, हृषीष्ट। हृषीयास्ताम्। अहार्षीत्, अहृत।
अहरिष्यत्, अहरिष्यत। धृञ् धारणे॥४॥
धरति, धरते। णीञ् प्रापणे॥५॥
नयति, नयते। डुपचष् पाके॥६॥
पचति, पचते। पपाच। पेचिथ,
पपक्थ। पेचे।
पक्तासि, पक्तासे। भज सेवायाम्॥७॥
भजति, भजते।
बभाज, भेजे। भक्तासि, भक्तासे। भक्ष्यति, भक्ष्यते। अभाक्षीत्। अभक्त।
अभक्षाताम्। यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु॥८॥
यजति, यजते॥
.....
अभार्षीः, अभार्ष्टम्, अभार्ष्ट, अभार्षम्, अभार्ष्व, अभार्ष्म।
वृद्धिः परस्मैपदेषु से भृ के ऋकार को वृद्धि होकर अभार्+स्+ईत् बना। सकार को षत्व
और रेफ का ऊर्ध्वगमन होकर वर्णसम्मेलन हुआ- अभार्षीत्। आगे- अभार्ष्टाम्, अभार्षुः,
५४५- ह्रस्वादङ्गात्। ह्रस्वात् पञ्चम्यन्तम्, अङ्गात् पञ्चम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। रात्सस्य से
सस्य, संयोगान्तस्य लोपः से लोपः और झलो झलि से झलि की अनुवृत्ति आती है।
ह्रस्वान्त अङ्ग से परे सिच् का लोप होता है झल् परे होने पर।
अभृत। भृ से आत्मनेपद में लुङ्, त, अट् का आगम, च्लि, सिच् होकर
अभृ+स्+त बना। उश्च से किद्वद्भाव होने के कारण गुण का निषेध हुआ। सकार का
ह्रस्वादङ्गात् से लोप हुआ- अभृत बन गया। जहाँ झल् परे नहीं मिलता, वहाँ सकार का
लोप नहीं होता है। रूप- अभृषाताम्, अभृषत, अभृथाः, अभृषाथाम्, अभृद्ववम्, अभृषि,
अभृष्वहि, अभृष्महि।
लृङ् परस्मैपद- अभरिष्यत्, अभरिष्यताम्, अभरिष्यन्, अभरिष्यः, अभरिष्यतम्, अभरिष्यत,
अभरिष्यम्, अभरिष्याव, अभरिष्याम। आत्मनेपद- अभरिष्यत, अभरिष्येताम्, अभरिष्यन्त,
अभरिष्यथाः, अभरिष्येथाम्, अभरिष्यध्वम्, अभरिष्ये, अभरिष्यावहि, अभरिष्यामहि।
हृञ् हरणे। हृञ् धातु हरण करना अर्थ में है। हरण के चार अर्थ हैं- प्रापण=ले
जाना, स्वीकार=स्वीकार करना, स्तेय=चुराना और नाशन= नाश करना। ञकार की इत्संज्ञा
होने के कारण स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से उभयपदी बन गया। लिट् लकार को
छोड़कर अन्य लकारों में भृ धातु की तरह ही रूप बनते हैं। भृ में द्वित्व हलादिशेष होकर
अभ्यासे चर्च से जश्त्व होता है तो हृ में द्वित्व, हलादिशेष होकर कुहोश्चु से चुत्व।
लट्- हरति, हरते। लिट्- (परस्मैपद) जहार, जहतुः, जहुः, जहर्थ, जहथुः, जह,
जहार-जहर, जहिव, जहिम। (आत्मनेपद) जहे, जहाते, जहिरे, जहिषे, जहाथे, जहिद्वे-जहिध्वे,
जहे, जहिवहे, जहिमहे। लुट्- हर्ता, हर्तासि, हर्तासे। लृट्- हरिष्यति, हरिष्यते। लोट्- हरतु,
हरताम्। लङ्- अहरत्, अहरत। विधिलिङ्- हरेत्, हरेत। आशीर्लिङ्- हियात्, हियास्ताम्,
हियासुः। हृषीष्ट, हृषीयास्ताम्, हृषीयासुः इत्यादि। लुङ्- (परस्मैपद) अहार्षीत्, अहार्ष्टाम्,
अहार्षुः, अहार्षीः, अहार्ष्टम्, अहार्ष्ट, अहार्षम्, अहार्ष्व, अहार्ष्म। (आत्मनेपद) अहत, अहृषाताम्, अहृषत, अहृथाः, अहृषाथाम्, अहृद्वम्, अहृषि, अहृष्वहि, अहृष्महि। लृङ्-अहरिष्यत्, अहरिष्यत।
उपसर्ग को लेकर इसी धातु पर एक पद्य प्रसिद्ध है-
उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते।
प्रहाराहारसंहारविहारपरिहारवत्॥ अर्थात् उपसर्ग से धातु का अर्थ अन्य रूप में हो जाता है। जैसे- हृ धातु में पृथक्-पृथक् उपसर्ग से प्र+हारः=प्रहार, आ+हारः=आहार आदि बनते हैं। इसी तरह प्रहरति, आहरति, संहरति, विहरति, परिहरति आदि।
धृञ् धारणे। धृञ् धातु धारण करना अर्थ में है। ञकार की इत्संज्ञा होने के कारण स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से उभयपदी बन गया। सभी लकारों में हृ धातु की तरह ही रूप बनते हैं।
लट्- धरति, धरते। लिट्-परस्मैपद- दधार, दध्रतुः, दध्रुः, दधर्थ, दध्रथुः, दध्र, दधार-दधर, दध्रिव, दध्रिम। (आत्मनेपद) दध्रे, दध्राते, दध्रिरे, दध्रिषे, दध्राथे, दध्रिद्वे-दध्रिध्वे, दध्रे, द्रधिवहे, दध्रिमहे। लृट्- धर्ता, धर्तासि, धर्तासे। लृट्- धरिष्यति, धरिष्यते। लोट्- धरतु, धरताम्। लङ्- अधरत्, अधरत। विधिलिङ्- धरेत्, धरेत। आशीर्लिङ्- ध्रियात्, ध्रियास्ताम्, ध्रियासुः। धृषीष्ट, धृषीयास्ताम्, धृषीरन् इत्यादि। लुङ्- (परस्मैपद) अधार्षीत्, अधार्ष्टम्, अधार्षुः, अधार्षीः, अधार्ष्टम्, अधार्ष्ट, अधार्षम्, अधार्ष्व, अधार्ष्म। (आत्मनेपद) अधृत, अधृषाताम्, अधृषत, अधृथाः, अधृषाथाम्, अधृद्वम्, अधृषि, अधृष्वहि, अधृष्महि। लृङ्- अधरिष्यत्, अधरिष्यत।
णीञ् प्रापणे। णीञ् धातु ले जाना अर्थ में है। णो नः से णकार के स्थान पर नकार आदेश होता है और ञकार इत्संज्ञक है। नी बचता है। यह भी अनिट् और उभयपदी है।
नयति। नी से लट्, तिप्, शप्, नी के ईकार को गुण और अय् आदेश करके नयति सिद्ध होता है। लिट् में निनि+अ, वृद्धि, आय् आदेश करके निनाय। अतुस् आदि अजादि विभक्ति के परे होने पर नी+अतुस् में द्विर्वचनेऽचि के नियम से पहले द्वित्व होकर अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङ्कुवङौ से प्राप्त इयङ् आदेश को बाधकर एरचेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य से यण् होकर निन्यतुः, निन्युः आदि बनते हैं। यही प्रक्रिया आत्मनेपद में भी होती है। लट्- नयति, नयते। लिट्- (परस्मैपद) निनाय, (यण् होकर) निन्यतुः, निन्युः, निनियथ-निनेथ, निन्यथुः, निन्य, निनाय-निनय, निन्यिव, निन्यिम। (आत्मनेपद) यण् होकर निन्ये, निन्याते, निन्यिरे, निन्यिषे, निन्याथे, निन्यिद्वे-निन्यिध्वे, निन्ये, निन्यिवहे, निन्यिमहे। लृट्- नेता, नेतासि, नेतासे। लृट्- नेष्यति, नेष्यते। लोट्- नयतु, नयताम्। लङ्- अनयत्, अनयत। विधि लिङ्- नयेत्, नयेताम्, नयेयुः। नयेत, नयेयाताम्, नयेरन्। आशीर्लिङ्- नीयात्, नीयास्ताम्, नीयासुः। नेषीष्ट, नेषीयास्ताम्, नेषीरन्। लुङ्- (परस्मैपद) अनैषीत्, अनैष्टाम्, अनैषुः, अनैषीः, अनैष्टम्, अनैष्ट, अनैषम्, अनैष्व, अनैष्म। (आत्मनेपद) अनेष्ट, अनेषाताम्, अनेषत। लृङ्- अनेष्यत्, अनेष्यत।
डुपचष् पाके। डुपचष् धातु पकाना अर्थ में है। आदिर्ञिटुडवः से डु की इत्संज्ञा होती है। षकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है और स्वरित अकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से। केवल पच् बचता है। स्वरितेत् होने के कारण उभयपदी है। लिट् में एत्वाभ्यासलोप,
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अनिद् होने के कारण थल् में वैकल्पिक इट्, लुट् में तासि के तकार के परे रहते पच् के चकार को चोः कुः से कुत्व होकर ककार आदेश होता है जिससे पक्ता रूप बनता है। लुट् में स्य के परे होने पर चकार को कुत्व और ककार से परे सकार को षत्व होने पर क् और ष् का संयोग होने पर क्ष् बनता है जिससे पक्ष्यति बनता है।
लट्- पचति, पचते। लिट्- ( परस्मैपद ) पपाच, पेचतुः, पेचुः, पेचिथ-पपक्थ, पेचथुः, पेच, पपाच-पपच, पेचिव, पेचिम। ( आत्मनेपद ) पेचे, पेचाते, पेचिरे, पेचिषे, पेचाथे, पेचिध्वे, पेचे, पेचिवहे, पेचिमहे। लुट्- पक्ता, पक्तारौ, पक्तारः, पक्तासि, आत्मनेपद में पक्तासे, पक्तासाथे, पक्ताध्वे आदि। लुट्- पक्ष्यति, पक्ष्यतः, पक्ष्यन्ति एवं पक्ष्यते, पक्ष्येते, पक्ष्यन्ते आदि। लोट्- पचतु, पचताम्। लङ्- अपचत्, अपचत। विधिलिङ्- पचेत्, पचेताम्, पचेयुः। पचेत, पचेयाताम् पचेरन्। आशीर्लिङ्- पच्यात्, पच्यास्ताम्, पच्यासुः। पक्षीष्ट, पक्षीयास्ताम्, पक्षीरन्। धातु के अनिद् होने के कारण लुङ्- में भी इट् नहीं होता है। अतः जहाँ-जहाँ झल् परे मिलता है, वहाँ-वहाँ झलो झलि से सकार का लोप होता है। ( परस्मैपद ) अपाक्षीत्, अपाक्ताम्, अपाक्षुः, अपाक्षीः, अपाक्तम्, अपाक्त, अपाक्षम्, अपाक्ष्व, अपाक्ष्म। ( आत्मनेपद ) अपक्त, अपक्षाताम्, अपक्षत, अपक्थाः, अपक्षाथाम्, अपग्ध्वम्, अपक्षि, अपक्ष्वहि, अपक्ष्महि। लृङ्- अपक्ष्यत्, अपक्ष्यत।
भज सेवायाम्। भज धातु सेवा करना, भजन करना, आश्रय लेना अर्थ में है। स्वरित अकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होती है। केवल भज् बचता है। स्वरितेत् होने के कारण उभयपदी है। लिट् में अभ्यासे चर्च से जश्त्व आदेश होने के कारण अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि प्राप्त नहीं था किन्तु तृफलभजत्रपश्च से एत्वाभ्यासलोप हो जाता है। अनिद् होने के कारण थल् में वैकल्पिक इट्, लुट् में तासि के तकार के परे रहते भज् के जकार को चोः कुः से कुत्व होकर ककार आदेश और ककार को खरि च से चर्त्व होकर ककार होता है जिससे भक्ता रूप बनता है। लुट् में स्य के परे होने पर जकार को कुत्व, उसे चर्त्व होकर ककार होता है और ककार से परे सकार को षत्व होने पर क् और ष् का संयोग होने पर क्ष् बनता है जिससे भक्ष्यति बनता है।
लट्- भजति, भजते। लिट्- ( परस्मैपद ) बभाज, भेभतुः, भेजुः, भेजिथ-बभक्थ, भेजथुः, भेज, बभाज-बभज, भेजिव, भेजिम। ( आत्मनेपद ) एत्वाभ्यास लोप होकर- भेजे, भेजाते, भेजिरे, भेजिषे, भेजाथे, भेजिध्वे, भेजे, भेजिवहे, भेजिमहे। लुट्- भक्ता, भक्तारौ, भक्तारः, भक्तासि, आत्मनेपद में भक्तासे, भक्तासाथे, भक्ताध्वे आदि। लुट्- भक्ष्यति, भक्ष्यतः, भक्ष्यन्ति एवं भक्ष्यते, भक्ष्येते, भक्ष्यन्ते आदि। लोट्- भजतु, भजताम्। लङ्- अभजत्, अभजत। विधि लिङ्- भजेत्, भजेताम्, भजेयुः। भजेत, भजेयाताम् भजेरन्। आशीर्लिङ्- भज्यात्, भज्यास्ताम्, भज्यासुः। भक्षीष्ट, भक्षीयास्ताम्, भक्षीरन्। लुङ्- ( परस्मैपद ) अभाक्षीत्, अभाक्ताम्, अभाक्षुः, अभाक्षीः, अभाक्तम्, अभाक्त, अभाक्षम्, अभाक्ष्व, अभाक्ष्म। ( आत्मनेपद ) अभक्त, अभक्षाताम्, अभक्षत, अभक्थाः, अभक्षाथाम्, अभग्ध्वम्, अभक्षि, अभक्ष्वहि, अभक्ष्महि। लृङ्- अभक्ष्यत्, अभक्ष्यत।
यज देवपूजा-सङ्गतिकरण-दानेषु। यज धातु देवताओं की पूजा करना, संगति करना तथा दान देना अर्थ में है। स्वरित अकार की इत्संज्ञा होती है, यज् बचता है। स्वरितेत् होने के कारण उभयपदी है। यह अनिद् है।