Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 540
इण्निषेधकं विधिसूत्रम्
न वृद्भ्यश्चतुर्भ्यः
Aṣṭādhyāyī 7.2.59
Vṛtti Varadarājācārya

वृतुवृधुशुधुस्यन्दूभ्यः सकारादेरार्धधातुकस्येण न स्यात् तङ्नयोरभावे।

वत्स्यिति, वर्तिष्यते। वर्तताम्। अवर्तत। वर्तेत। वर्तिषीष्ट। अवर्तिष्ट।

अवत्स्यित्, अवर्तिष्यत। दद दाने॥१९॥

ददते।

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

स्रंसु, भ्रंसु, ध्वंसु अवस्रंसने। ध्वंसु गतौ च। ये तीनों धातु नीचे गिरना अर्थ में हैं और ध्वंसु धातु गति अर्थ में भी है। सबमें उकार की इत्संज्ञा होती है और स्रंसु, भ्रंसु, ध्वंसु शेष रहते हैं। अन्य लकारों में सामान्य रूप होते हैं किन्तु लुङ् लकार में अङ् होने के पक्ष में अनिदितां हल उपधाया विङ्ति से नकार से उत्पन्न अनुस्वार का लोप होकर अस्रसत्, अभ्रसत्, अध्वसत् ये रूप बनते हैं। स्रंसु के रूप- स्रंसते, सस्रंसे, स्रंसिता, स्रंसिष्यते, स्रंसताम्, अस्रंसत, स्रंसेत, स्रंसिषीष्ट, अस्रसत्-अस्रंसिष्ट, अस्रंसिष्यत। इसी तरह भ्रंसु के भी रूप बनाइये- भ्रंसते, बभ्रंसे, भ्रंसिता, भ्रंसिष्यते, भ्रंसताम्, अभ्रंसत, भ्रंसेत, भ्रंसिषीष्ट, अभ्रसत्-अभ्रंसिष्ट, अभ्रंसिष्यत। एवं प्रकारेण ध्वंसु के रूप- ध्वंसते, दध्वंसे, ध्वंसिता, ध्वंसिष्यते, ध्वंसताम्, अध्वंसत, ध्वंसेत, ध्वंसिषीष्ट, अध्वसत्-अध्वंसिष्ट, अध्वंसिष्यत।

स्रम्भु विश्वासे। स्रम्भु धातु विश्वास करना अर्थ में है। उकार की इत्संज्ञा होती है, स्रम्भु शेष रहता है। स्रन्+भ् में नकार को अनुस्वार और परसवर्ण करके स्रम्भु बना है। अन्य लकारों में सामान्य रूप होते हैं किन्तु लुङ् लकार में अङ् होने के पक्ष में अनिदितां हल उपधाया विङ्ति से नकार से उत्पन्न मकार का लोप होकर अस्रभत् बनता है। स्रम्भते, सस्रम्भे, स्रम्भिता, स्रम्भिष्यते, स्रम्भताम्, अस्रम्भत, स्रम्भेत, स्रम्भिषीष्ट, अस्रभत्-अस्रम्भिष्ट, अस्रम्भिष्यत।

वृतु वर्तने। वृतु धातु वर्तन अर्थात् होना अर्थ में है। उकार की इत्संज्ञा होकर वृत् शेष रहता है।

वर्तते। ववृते। वर्तिता। वृत् से लट्, त, शप्, अनुबन्धलोप होकर वृत्+अत बना। पुगन्तलघूपधस्य च से वृ के ऋकार के स्थान पर गुण होकर अर् हुआ, व्+अर्=वर्, वर्+त्=वर्त्, वर्त्+अत बना। एत्व और वर्णसम्मेलन होकर वर्तते सिद्ध हुआ। लिट् में वृत्+त, वृत्+ए, वृत्+वृत्+ए, वृ+वृत्+ए, (उरत्) वर्+वृत्+ए, व्+वृत्+ए=ववृते सिद्ध होता है और लुट् में वृत्+इ+तास्+ति, वृत्+इ+तास्+डा, वृत्+इ+ता, वर्त्+इ+ता=वर्तिता बनता है।

५४०- न वृद्ध्यश्चतुर्भ्यः। न अव्ययपदं, वृद्ध्यः पञ्चम्यन्तं, चतुर्भ्यः पञ्चम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। सेऽसिचि.....से से, आर्धधातुकस्येड् वलादेः से आर्धधातुकस्य और गमेरिट् परस्मैपदेषु से परस्मैपदेषु की अनुवृत्ति आती है।

परस्मैपद अर्थात् तङ् और आन का विषय न हो तो वृत् आदि चार धातुओं से सकारादि आर्धधातुक के परे इट् का आगम नहीं होता।

वृद्ध्यः यह बहुवचन गण को सूचित करता है। वृत् गण में चार धातु वृतु, वृधु, शृधु और स्यन्दू हैं। सकारादि आर्धधातुक लृट् और लृङ् में मिलता है।

वर्त्स्यति, वर्तिष्यते। वृत् से लृट्, वृद्ध्यः स्यसनोः से वैकल्पिक परस्मैपद का विधान हुआ, स्य प्रत्यय करके आर्धधातुकस्येड्वलादेः से इट् आगम की प्राप्ति थी किन्तु परस्मैपद के पक्ष में न वृद्ध्यश्चतुर्भ्यः से निषेध हुआ, गुण होकर वर्त्+स्यति=वर्त्स्यति सिद्ध हुआ। परस्मैपद न होने के पक्ष में आत्मनेपद और आत्मनेपद होने पर इट् का निषेध नहीं हुआ। अतः वर्तिष्यते यह रूप बना। इस तरह लृट् और लृङ् में दो-दो रूप बनते हैं।

लृट्- वर्तते, वर्तेते, वर्तन्ते, वर्तसे, वर्तेथे, वर्तध्वे, वर्ते, वर्तावहे, वर्तामहे।

लिट्- ववृते, ववृताते, ववृतिरे, ववृतिषे, ववृताथे, ववृतिध्वे, ववृते, ववृतिवहे, ववृतिमहे।

लुट्- वर्तिता, वर्तितारौ, वर्तितारः, वर्तितासे, वर्तितासाथे, वर्तिताध्वे, वर्तिताहे, वर्तितास्वहे,

वर्तितास्महे। लृट्- (परस्मैपद) वर्त्स्यति, वर्त्स्यतः, वर्त्स्यन्ति, वर्त्स्यसि, वर्त्स्यथः,

वर्त्स्यथ, वर्त्स्यामि, वर्त्स्यावः, वर्त्स्यामः। (आत्मनेपद) वर्तिष्यते, वर्तिष्येते, वर्तिष्यन्ते,

वर्तिष्यसे, वर्तिष्येथे, वर्तिष्यध्वे, वर्तिष्ये, वर्तिष्यावहे, वर्तिष्यामहे। लोट्- वर्तताम्,

वर्तेताम्, वर्तन्ताम्, वर्तस्व, वर्तेथाम्, वर्तध्वम्, वर्ते, वर्तावहे, वर्तामहे। लङ्- अवर्तत,

अवर्तेताम्, अवर्तन्त, अवर्तथाः, अवर्तेथाम्, अवर्तध्वम्, अवर्ते, अवर्तावहि, अवर्तामहि।

विधिलिङ्- वर्तेत, वर्तेयाताम्, वर्तेरन्, वर्तेथाः, वर्तेयाथाम्, वर्तेध्वम्, वर्तेय, वर्तेवहि,

वर्तेमहि। आशीर्लिङ्- वर्तिषीष्ट, वर्तिषीयास्ताम्, वर्तिषीरन्, वर्तिषीष्ठाः, वर्तिषीयास्थाम्,

वर्तिषीध्वम्, वर्तिषीय, वर्तिषीवहि, वर्तिषीमहि। लृङ् में- द्युद्ध्यो लुङि से एकपक्ष में

परस्मैपद हो जाता है और पुषादिद्युताद्यूलृदितः परस्मैपदेषु से अङ् होता है। अवृतत्,

अवृतताम्, अवृतन्, अवृतः, अवृततम्, अवृतत, अवृतम्, अवृताव, अवृताम। आत्मनेपद

में इट् होता है। अवर्तिष्ट, अवर्तिषाताम्, अवर्तिषत, अवर्तिष्ठाः, अवर्तिषाथाम्, अवर्तिढ्वम्,

अवर्तिषि, अवर्तिष्वहि, अवर्तिष्महि। लृङ् में वृद्ध्यः स्यसनोः से परस्मैपद होने के पक्ष

में इट् का निषेध और आत्मनेपद में इट् होता है- अवर्त्स्यत्, अवर्त्स्यताम्, अवर्त्स्यन्,

अवर्त्स्यः, अवर्त्स्यतम्, अवर्त्स्यत, अवर्त्स्यम्, अवर्त्स्याव, अवर्त्स्याम और आत्मनेपद

में- अवर्तिष्यत, अवर्तिष्येताम्, अवर्तिष्यन्त, अवर्तिष्यथाः, अवर्तिष्येथाम्, अवर्तिष्यध्वम्,

अवर्तिष्ये, अवर्तिष्यावहि, अवर्तिष्यामहि।

दद दाने। दद धातु देना इस अर्थ में है। अकार अनुदात्त है, उसकी इत्संज्ञा होती है। अतः आत्मनेपदी है। इससे लृट्, त्, शप्, एत्व करके ददते रूप बनता है।