Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 539
वैकल्पिकपरस्मैपदविधायकं विधिसूत्रम्
वृद्भ्यः स्यसनोः
Aṣṭādhyāyī 1.3.92
Vṛtti Varadarājācārya

वृतादिभ्यः पञ्चभ्यो वा परस्मैपदं स्यात् स्ये सनि च।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५३९- वृद्ध्यः स्यसनोः। स्यश्च सन् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः स्यसनौ, तयोः स्यसनोः। वृद्ध्यः पञ्चम्यन्तं, स्यसनोः सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। वा क्यषः से वा तथा शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् से परस्मैपदम् की अनुवृत्ति आती है।

स्य और सन् के परे होने पर वृत् आदि पाँच धातुओं से विकल्प से परस्मैपद होता है।

वृतु वर्तने(होना), वृधु वृद्धौ(बढ़ना), श्रुधु शब्दकुत्सायाम्(कुत्सित शब्द करना, अपान वायु का शब्द होना), स्यन्दू प्रस्रवणे( बहाना) और कृपू सामर्थ्ये( समर्थ होना) ये पाँच धातुएँ वृतादि हैं।