Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 538
वैकल्पिकपरस्मैपदविधायकं विधिसूत्रम्
द्युद्भ्यो लुङि
Aṣṭādhyāyī 1.3.91
Vṛtti Varadarājācārya

द्युतादिभ्यो लुङः परस्मैपदं वा स्यात्। पुषादीत्यङ्। अद्युतत्, अद्योतिष्ट।

अद्योतिष्यत। एवं श्विता वर्णे॥५॥

जिमिदा स्नेहने॥६॥

जिष्विदा स्नेहनमोचनयोः॥७॥

मोहनयोरित्येके। जिक्षिवदा चेत्येके।

रुच दीप्तावभिप्रीतौ च॥८॥

घुट परिवर्तने॥९॥ शुभ दीप्तौ॥१०॥

क्षुभ संचलने॥११॥

णभ तुभ हिंसायाम्॥१२, १३॥

अंसु भ्रंसु, ध्वंसु अवस्रंसने॥१४, १५, १६॥ ध्वंसु गतौ च।

अम्भु विश्वासे॥१७॥ वृतु वर्तने॥१८॥

वर्तते। ववृते। वर्तिता।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५३८- द्युद्भ्यो लुङि। द्युद्भ्यः पञ्चम्यन्तं, लुङि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। वा क्यषः से वा तथा शेषात्कर्तरि परस्मैपदम् से परस्मैपदम् की अनुवृत्ति आती है। द्युत् आदि धातुओं से परे लुङ् के स्थान पर विकल्प से परस्मैपद होता है।

धातुपाठ में द्युतादिगण में बाईस धातु पढ़े गये हैं, उनका यहाँ पर ग्रहण होता है। विकल्प से होने के कारण लुङ् के स्थान पर एकपक्ष में परस्मैपद और एकपक्ष में आत्मनेपद होते हैं। ऐसा केवल लुङ् लकार में है, अन्य लकारों में तो आत्मनेपद ही होता है। अद्युतत्। द्युत् से लुङ् लकार आने पर द्युद्भ्यो लुङि से वैकल्पिक परस्मैपद का विधान हुआ। अट् का आगम, ति में इकार का इतश्च से लोप करके अद्युत्+त् बना। च्लि करके उसके स्थान पर पुषादिद्युताद्यूलृदितः परस्मैपदेषु से अङ् आदेश होकर अद्युत्+अत् बना। पुगन्तलघूपधस्य च से गुण होकर अद्योत्+अत्, वर्णसम्मेलन होकर अद्योतत् बना। सिच् न होने के कारण अस्तिसिचोऽपृक्ते से ईट् और वलादि न होने के कारण आर्धधातुकस्येङ् वलादेः से इट् का आगम दोनों नहीं हुए। परस्मैपद न होने के पक्ष में आत्मनेपद होगा जिसमें अङ् न होने के कारण सिच् होता है और वलादिलक्षण इट् का आगम करके गुण, षत्व, ष्टुत्व करने पर अद्योतिष्ट यह रूप सिद्ध होता है। लुङ् के परस्मैपद में- अद्युतत्, अद्युतताम्, अद्युतन्, अद्युतः, अद्युततम्, अद्युतत, अद्युतम्, अद्युताव, अद्युताम्। आत्मनेपद में- अद्योतिष्ट, अद्योतिषाताम्, अद्योतिषत, अद्योतिष्ठाः, अद्योतिषाथाम्, अद्योतिष्ठ्वम्, अद्योतिषि, अद्योतिष्वहि, अद्योतिष्महि। लृङ्- अद्योतिष्यत, अद्योतिष्येताम्, अद्योतिष्यन्त, अद्योतिष्यथाः, अद्योतिष्येथाम्, अद्योतिष्यध्वम्, अद्योतिष्ये, अद्योतिष्यावहि, अद्योतिष्यामहि।

एवं श्विता वर्णे। इसी तरह श्विता आदि धातुओं के रूप बनते हैं। श्विता धातु सफेद होना अर्थ में है। आकार की इत्संज्ञा होती है, श्वित् बचता है। इसके रूप द्युत् की तरह ही होते हैं- श्वेतते, श्वेतेते, श्वेतन्ते इत्यादि। द्युत् में उकार को गुण होकर ओकार होता है तो श्वित् में इकार को गुण होकर एकार होता है, यही अन्तर है। लिट्- शिश्विते, शिश्विताते, शिश्वितिरे। लृट्- श्वेतिता, श्वेतितारौ, श्वेतितारः। लृट्- श्वेतिष्यते, श्वेतिष्येते, श्वेतिष्यन्ते। लोट्- श्वेतताम्, श्वेतेताम्, श्वेतन्ताम्। लङ्- अश्वेतत, अश्वेतेताम्, अश्वेतन्त। विधिलिङ्- श्वेतेत, श्वेतेयाताम्, श्वेतेरन्। आशीर्लिङ्- श्वेतिषीष्ट, श्वेतिषीयास्ताम् श्वेतिषीरन्।

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लुङ् के परस्मैपद में- अश्वेतत्, अश्वेतताम्, अश्वेतन्। लुङ् के आत्मनेपद में- अश्वेतिष्ट, अश्वेतिषाताम्, अश्वेतिषत। लृङ्- अश्वेतिष्यत, अश्वेतिष्येताम्, अश्वेतिष्यन्त।

जिमिदा स्नेहने। जिमिदा धातु चिकना होना, गीला होना अर्थ में है। जि की आदिर्जिटुडवः से और दकारोत्तरवर्ती आकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होती है। मिद् बचता है। इसके रूप भी द्युत् की तरह ही होते हैं। हम यहाँ पर प्रत्येक लकार में मात्र एक रूप ही दिखा रहे हैं किन्तु आप तीनों पुरुषों के तीनों वचनों में रूप बनाने का प्रयत्न करना। रूप- मेदते। मिमिदे। मेदिता। मेदिष्यते। मेदताम्। अमेदत। मेदेत। मेदिषीष्ट। अमिदत्-अमेदिष्ट। अमेदिष्यत।

जिष्विदा स्नेहन-मोचनयोः। मोहनयोरित्येके। जिक्षिवदा चेत्येके। जिष्विदा धातु स्नेहन अर्थात् गिन्ध होना, पसीना होना और पसीना छोड़ना अर्थ में है। कुछ आचार्य स्नेहन और मोहन अर्थात् मोहित होना ऐसा अर्थ मानते हैं तो कुछ आचार्य धातु को ही जिष्विदा की जगह जिक्षिवदा मानते हैं। जि की आदिर्जिटुडवः से तथा आकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होती है। धात्वादेः षः सः से षकार के स्थान पर सकार आदेश होता है। इस तरह स्विद् बचता है। जिक्षिवदा धातु मानने के पक्ष में क्षिवद् बचता है। इसके रूप भी द्युत् धातु की तरह ही होते हैं। स्वेदते। सिस्विदे। स्वेदिता। स्वेदिष्यते। स्वेदताम्। अस्वेदत। स्वेदेत। स्वेदिषीष्ट। अस्विदत-अस्वेदिष्ट। अस्वेदिष्यत। अथवा क्षेवेदते। चिक्षिवदे। क्षेवेदिता। क्षेवेदिष्यते। क्षेवेदताम्। अक्षेवेदत। क्षेवेदेत। क्षेवेदिषीष्ट। अक्षिवदत्-अक्षेवेदिष्ट। अक्षेवेदिष्यत।

रुच दीप्तावभिप्रीतौ च। रुच धातु चमकना और प्रीति का विषय होना अर्थ में है। अकार की इत्संज्ञा होती है। रुच् बचता है। इसके रूप द्युत् की तरह ही बनते हैं। रोचते। रुरुचे। रोचिता। रोचिष्यते। रोचताम्। अरोचत। रोचेत। रोचिषीष्ट। अरुचत्-अरोचिष्ट। अरोचिष्यत।

घुट परिवर्तने। घुट धातु परिवर्तन होना अर्थ में है। अकार की इत्संज्ञा होकर घुट् शेष रहता है। घोटते। जुघुटे। घोटिता। घोटिष्यते। घोटताम्। अघोटत। घोटेत। घोटिषीष्ट। अघुटत्-अघोटिष्ट। अघोटिष्यत।

शुभ दीप्तौ। शुभ धातु चमकना, शोभा पाना अर्थ में है। अकार की इत्संज्ञा होकर शुभ् बचता है। शोभते। शुशुभे। शोभिता। शोभिष्यते। शोभताम्। अशोभत। शोभेत। शोभिषीष्ट अशुभत्-अशोभिष्ट। अशोभिष्यत।

क्षुभ सञ्चलने। क्षुभ धातु व्याकुल होना या विचलित होना अर्थ में है। अकार की इत्संज्ञा होने के बाद क्षुभ् के रूप भी द्युत् की तरह ही चलते हैं। क्षोभते। चुक्षुभे। क्षोभिता। क्षोभिष्यते। क्षोभताम्। अक्षोभत। क्षोभेत। क्षोभिषीष्ट। अक्षुभत्-अक्षोभिष्ट। अक्षोभिष्यत।

णभ हिंसायाम्। णभ धातु हिंसा करना अर्थ में है। णो नः से आदि में स्थित णकार के स्थान पर नकार आदेश और भकार के अकार की इत्संज्ञा होकर नभ् शेष रहता है। नभते। एत्वाभ्यासलोप होकर- नेभे, नेभाते, नेभिरे। नभिता। नभिष्यते। नभताम्। अनभत। नभेत। नभिषीष्ट। अनभत्-अनभिष्ट। अनभिष्यत।

तुभ हिंसायाम्। तुभ धातु हिंसा करना अर्थ में है। अकार की इत्संज्ञा होकर रूप बनते हैं- तोभते। तुतुभे। तोभिता। तोभिष्यते। तोभताम्। अतोभत। तोभेत। तोभिषीष्ट। अतुभत्-अतोभिष्ट। अतोभिष्यत।