अनयोरभ्यासस्य सम्प्रसारणं स्यात्। दिद्युते।
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५३७- द्युतिस्वाप्योः सम्प्रसारणम्। द्युतिश्च स्वापिश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वो द्युतिस्वापी, तयोर्द्युतिस्वाप्योः। द्युतिस्वाप्योः सप्तम्यन्तं, सम्प्रसारणं प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य की अनुवृत्ति आती है।
द्युत् धातु तथा ण्यन्त स्वप् धातु के अभ्यास को सम्प्रसारण होता है।
स्मरण रहे कि इग्यणः सम्प्रसारणम् के नियम से यण् के स्थान पर होने वाले इक् को सम्प्रसारण कहते हैं अर्थात् सम्प्रसारण का तात्पर्य यण् के स्थान पर इक् होना है। यहाँ द्युत् धातु को द्वित्व करने पर अभ्यास अर्थात् पूर्व द्युत् में विद्यमान यकार के स्थान पर इकार होता है।
दिद्युते। द्युत् से लिट्, उसके स्थान त आदेश, उसके स्थान पर एश् आदेश करके द्वित्व करने पर द्युत्+द्युत्+ए बना है। अभ्याससंज्ञक प्रथम द्युत् में विद्यमान यकार के स्थान पर द्युतिस्वाप्योः सम्प्रसारणम् से सम्प्रसारण आदेश करने पर इकार हुआ, द्+इ+उत् बना। इ+उ में सम्प्रसारणाच्च से पूर्वरूप होकर इकार ही हुआ, दित्+द्युत्+ए बना। हलादिशेष होकर दिद्युत्+ए बना। वर्णसम्मेलन करके दिद्युते यह रूप सिद्ध हुआ।
लिट्- दिद्युते, दिद्युताते, दिद्युतिरे, दिद्युतिषे, दिद्युताथे, दिद्युतिध्वे, दिद्यते, दिद्युतिवहे, दिद्युतिमहे। लृट्- द्योतिता, द्योतितारौ, द्योतितारः, द्योतितासे, द्योतितासाथे, द्योतिताध्वे, द्योतिताहे, द्योतितास्वहे, द्योतितास्महे। लृट्- द्योतिष्यते, द्योतिष्येते, द्योतिष्यन्ते, द्योतिष्यसे, द्योतिष्येथे, द्योतिष्यध्वे, द्योतिष्ये, द्योतिष्यावहे, द्योतिष्यामहे। लोट्- द्योतताम्, द्योतेताम्, द्योतन्ताम्, द्योतस्व, द्योतेथाम्, द्योतध्वम्, द्योतै, द्योतावहै, द्योतामहै। लङ्- अद्योतत, अद्योतेताम्, अद्योतन्त, अद्योतथाः, अद्योतेथाम्, अद्योतध्वम्, अद्योते, अद्योतावहि, अद्योतामहि। विधिलिङ्- द्योतेत, द्योतेयाताम्, द्योतेरन्, द्योतेथाः, द्योतेयाथाम्, द्योतेध्वम्, द्योतेय, द्योतेवहि, द्योतेमहि। आशीर्लिङ्- द्योतिषीष्ट, द्योतिषीयास्ताम्, द्योतिषीरन्, द्योतिषीष्ठाः, द्योतिषीयास्थाम्, द्योतिषीध्वम्, द्योतिषीय, द्योतिर्पावाह. द्योतिषीमहि।