लोडुत्तमस्य एतः ऐः स्यात्।
एधै। एधावहै। एधामहै। आटश्च। ऐधत। ऐधेताम्। ऐधन्त। ऐधथाः।
ऐधेथाम्। ऐधध्वम्। ऐधे। ऐधावहि। ऐधामहि।
५१९- एत ऐ। एतः षष्ठ्यन्तम्, ऐ लुप्तप्रथमाकं, द्विपदमिदं सूत्रम्। लोटो लङ्वत् से लोटः और आडुत्तमस्य पिच्च से उत्तमस्य की अनुवृत्ति आती है।
लोट् लकार के उत्तमपुरुष के एकार के स्थान पर ऐकार आदेश होता है।
एधै। एध् धातु से लोट्, इ आदेश, शप्, एध्+अ+इ बना है। इ के स्थान पर एत्व होकर एध् अ ए बना और एत ऐ से एकार के स्थान पर ऐकार आदेश हुआ- एध् अ ऐ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- एधै।
एधावहै। एधामहै। शप् करके के बाद एध् अ वहि और एध् अ महि बना है।
अतो दीर्घो यजि से शप् के अकार को दीर्घ और टि को एत्व करने के बाद एध् आ वहे और एध् आ महे बना, एकार के स्थान एत ऐ से ऐकारादेश करके वर्णसम्मेलन करने पर एधावहे और एधामहे ये रूप सिद्ध हो जाते हैं।
इस प्रकार से एध् धातु के लोट् लकार में रूप बने- एधताम्, एधेताम्, एधन्ताम्, एधस्व, एधेथाम्, एधध्वम्, एधै, एधावहे, एधामहे।
ऐधत। एध् धातु से लङ् लकार, त आदेश, एध् त बना। अजादि धातु होने के कारण धातु के पहले लुङ् लङ् लङ् क्ष्वडुदात्तः को बाधकर आडजादीनाम् से आट् का आगम हुआ। आ+एध्+त बना। सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप करके आ+एध्+अ+त बना। आ+एध् में आटश्च से वृद्धि हुई, एध् बना। वर्णसम्मेलन हुआ- ऐधत यह रूप सिद्ध हुआ। लङ् लकार और उसके बाद के लकार टित् नहीं हैं, डित् हैं। अतः टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व नहीं होगा। थास् के स्थान पर से आदेश भी नहीं होगा। आताम् और आथाम् में आतो डितः से इय् आदेश और यकार का लोपो व्योर्वलि से लोप, झ में झकार के स्थान पर अन्त् आदेश और अतो गुणे से पररूप, इट् के परे होने पर शप् के अकार और इ में गुण, वहि और महि में अतो दीर्घो यजि से दीर्घ आदि करके लुङ् लकार के रूप बनाइये- ऐधत, ऐधेताम्, ऐधन्त, ऐधथाः, ऐधेथाम्, ऐधध्वम्, ऐधे, ऐधावहि, ऐधामहि।