Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 513
एशिरेजादेशविधायकं विधिसूत्रम्
लिटस्तझयोरेशिरेच्
Aṣṭādhyāyī 3.4.81
Vṛtti Varadarājācārya

लिडादेशयोस्तझयोरेश्-इरेजेतौ स्तः।

एधाञ्चक्रे। एधाञ्चक्राते। एधाञ्चक्रिरे। एधाञ्चकृषे। एधाञ्चक्राथे।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५१३- लिटस्तझयोरेशिरेच्। तश्च झश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वस्तझौ, तयोस्तझयोः। एश् च इरेच् च तयोः समाहारद्वन्द्वः एशिरेच्। लिटः षष्ठ्यन्तं, तझयोः षष्ठ्यन्तम्, एशिरेच् प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

लिट् लकार के स्थान पर आदेश हुए त और झ के स्थान पर क्रमशः एश् और इरेच् आदेश होते हैं।

एधाञ्चक्रे। एध् धातु से लिट् लकार, त आदेश, एध् त बना। सूत्र लगा-इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः। एध् धातु इजादि है (आदि वर्ण एकार इच् है और गुरुमान् भी)। लिट् परे भी है। अतः धातु से आम् प्रत्यय हुआ, एधाम् त बना। आमः से आम् से परे लिट् लकार सम्बन्धी त का लोप हुआ, एधाम् रह गया। कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि से लिट् को साथ में लेकर कृ धातु का अनुप्रयोग हुआ, एधाम् कृ लिट् बना। लिट् के स्थान पर आम्प्रत्ययवत्कृञोऽनुप्रयोगस्य से आत्मनेपद का त आदेश हुआ। एधाम् कृ त बना। त के स्थान पर लिटस्तझयोरेशिरेच् से एश् आदेश हुआ, शकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप हुआ। एधाम्+कृ+ए बना। इस स्थिति में इको यणचि से यण् प्राप्त था, उसका द्विर्वचनेऽचि से निषेध हुआ। फिर कृ का लिटि धातोरनभ्यासस्य से द्वित्व हुआ, एधाम् कृ कृ ए बना। प्रथम कृ की पूर्वोऽभ्यासः से अभ्याससंज्ञा हुई और उरत् से ऋकार के स्थान अत् आदेश हुआ और उरण् रपरः की सहायता रपर होकर अर् आदेश हुआ, एधाम् कर् कृ ए बना। हलादि शेषः से कर् में ककार का शेष और रकार का लोप हुआ। एधाम् ककृ ए बना। कुहोश्चुः से अभ्याससंज्ञक ककार के स्थान पर चवर्ग में च आदेश होकर एधाम् चकृ ए बना। आमन्त एधाम् आदि मान्त और लिट् लकार की धातु से विहित होने के कारण कृत्संज्ञक भी है। अतः एधाम् को कृदन्त मानकर कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा करके स्वादि प्रत्यय आते हैं। एधाम् का कृन्मेजन्तः से अव्ययसंज्ञा होने से उन सु आदि प्रत्ययों का अव्ययादाप्सुपः से लोप हो जाता है। सु आदि के लोप होने पर भी एकदेशविकृतमनन्यवत् न्याय से पूर्व में की हुई पदसंज्ञा रहती है। अतः पदान्त में होने के कारण एधाम् के मकार के स्थान पर मोऽनुस्वारः से अनुस्वार और अनुस्वार के स्थान पर वा पदान्तस्य से परसवर्ण होकर ञकार आदेश हुआ तो एधाञ्चक् ए बना। लिट्-लकार-सम्बन्धी ए तो लिट् च सूत्र से आर्धधातुकसंज्ञक है ही, अतः सार्वधातुकार्धधातुकयोः से ऋकार के स्थान पर गुण प्राप्त था किन्तु असंयोगाल्लिट् कित् से लिट् लकार कित् बन गया है, इसलिए किङ्ति च से गुणनिषेध हुआ। एधाञ्चक्+ए में इको यणचि से यण् होकर ऋकार के स्थान पर रकार आदेश हुआ-एधाञ्चक् र् ए बना। वर्णसम्मेलन हुआ- एधाञ्चक्रे।

एधाञ्चक्राते। लिट् लकार के प्रथमपुरुष के द्विवचन में भी इसी प्रकार से प्रक्रिया करनी है। जैसे एध् धातु से लिट् लकार, आताम् आदेश, एध् आताम् बना। सूत्र

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लगा इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः। एध् धातु इजादि और गुरुमान् है। लिट् परे भी है। अतः धातु से आम् प्रत्यय हुआ, एधाम् आताम् बना। आमः से आम् से पर लिट् लकार सम्बन्धी आताम् का लोप हुआ, एधाम् रह गया। कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि से लिट् को साथ में लेकर कृ धातु का अनुप्रयोग हुआ, एधाम् कृ लिट् बना। लिट् के स्थान पर आम्प्रत्ययवत्कृञोऽनुप्रयोगस्य से आत्मनेपद का विधान हुआ, द्विवचन में आताम् आदेश हुआ। एधाम् कृ आताम् बना। द्विर्वचनेऽचि से द्वित्व की कर्तव्यता में यण् के निषेध होकर कृ का लिटि धातोरनभ्यासस्य से द्वित्व हुआ, एधाम् कृ कृ आताम् बना। प्रथम कृ की पूर्वोऽभ्यासः से अभ्याससंज्ञा हुई और उरत् से ऋकार के स्थान पर अत् आदेश हुआ और उरण् रपरः की सहायता रपर होकर अर् आदेश हुआ, एधाम् कर् कृ आताम् बना। हलादि शेषः से कर् में ककार का शेष और रकार का लोप हुआ। एधाम् ककृ आताम् बना। कुहोश्चुः से अभ्याससंज्ञक ककार के स्थान पर चर्वा में च आदेश होकर एधाम् चकृ आताम् बना। एधाम् के मकार के स्थान पर मोऽनुस्वारः से अनुस्वार और अनुस्वार के स्थान पर वा पदान्तस्य से परसवर्ण होकर ञकार आदेश हुआ तो एधाञ्चकृ आताम् बना। लिट्-लकार-सम्बन्धी ए तो लिट् च सूत्र से आर्धधातुकसंज्ञक है ही, अतः सार्वधातुकार्धधातुकयोः से ऋकार के स्थान पर गुण प्राप्त था किन्तु असंयोगाल्लिट् कित् से लिट्-लकार कित् बन गया है, इसलिए किङ्ति च से गुणनिषेध हुआ। एधाञ्चकृ+आताम् में इको यणचि से यण् होकर ऋकार के स्थान पर रकार आदेश हुआ- एधाञ्चकृ र् आताम् बना। आताम् में टिसंज्ञक आम् के स्थान पर टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व हुआ, एधाञ्चकृ आते बना, वर्णसम्मेलन हुआ- एधाञ्चक्राते। इसी प्रकार से पूरे लिट् लकार में एधाञ्चकृ तक बन जाने के बाद आगे के प्रत्यय के साथ प्रक्रिया करनी चाहिए अर्थात् धातु से लिट्, आम्, उसका लुक्, पुनः लिट् को साथ लेकर कृ का अनुप्रयोग, अनुप्रयुक्त कृ धातु को द्वित्व, उरत् से अत्, रपर, हलादिशेष, अभ्यास को चर्त्व, अनुस्वार, परसवर्ण आदि प्रक्रियाएँ होती हैं।

एधाञ्चक्रिरे। लिट् लकार के प्रथमपुरुष के बहुवचन में झ के स्थान पर लिटस्तझयोरेशिरेच् से इरेच् आदेश और अनुबन्धलोप करके अन्य प्रक्रिया एधाञ्चकृ बनाने तक पूर्ववत् करें, एधाञ्चकृ इरे बन जायेगा। एधाञ्चकृ+इरे में इको यणचि से यण् होकर एधाञ्चकृ इरे बना, वर्णसम्मेलन हुआ- एधाञ्चक्रिरे।

एधाञ्चकृषे। मध्यमपुरुष के एकवचन में एधाञ्चकृ तक की प्रक्रिया पूर्ववत् ही होगी किन्तु थास् के स्थान थासः से से से आदेश होकर एधाञ्चकृ+से बना है और आदेशप्रत्यययोः से षत्व होकर एधाञ्चकृषे रूप बनता है। यहाँ पर आर्धधातुकस्येड्वलादेः से इट् का आगम नहीं होगा क्योंकि अब यहाँ पर कृ धातु बन गया है और यह अनिट् धातु है। केवल एध् धातु से तो एधिता आदि में इट् होता ही है।

एधाञ्चक्राथे। मध्यमपुरुष के द्विवचन में एधाञ्चकृ तक की प्रक्रिया पूर्ववत् ही होगी किन्तु आथाम् में टिसंज्ञक आम् के स्थान पर टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व होकर एधाञ्चकृ आथे बना है। इको यणचि से यण् होकर एधाञ्चकृ आथे बन गया। एधाञ्चकृ+आथे में इको यणचि से यण् होकर एधाञ्चकृ आथे बना, वर्णसम्मेलन होकर एधाञ्चक्राथे ऐसा रूप सिद्ध हुआ।