Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 514
ढत्वविधायकं विधिसूत्रम्
इणः षीध्वंलुङ्लिटां धोऽङ्गात्
Aṣṭādhyāyī 8.3.78
Vṛtti Varadarājācārya

इणन्तादङ्गात्परेषां षीध्वंलुङ्लिटां धस्य ढः स्यात्।

एधाञ्चकृद्वे। एधाञ्चक्रे। एधाञ्चकृवहे। एधाञ्चकृमहे। एधाम्बभूव।

एधामास। एधिता। एधितारौ। एधितारः। एधितासे। एधितासाथे।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५१४- इणः षीध्वंलुङ्लिटां धोऽङ्गात्। षीध्वं च लुङ् च लिट् च तेषामितरेतरद्वन्द्वः षीध्वंलुङ्लिटः, तेषां षीध्वंलुङ्लिटाम्। इणः पञ्चम्यन्तं, षीध्वंलुङ्लिटां षष्ठ्यन्तं, धः प्रथमान्तम्, अङ्गात् पञ्चम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। अपदान्तस्य मूर्धन्यः से मूर्धन्यः की अनुवृत्ति आती है।

इणन्त अङ्ग से परे षीध्वम्, लुङ् और लिट् लकार से सम्बन्धित धकार के स्थान पर मूर्धन्य आदेश अर्थात् ढकार आदेश होता है।

धकार के स्थान पर प्राप्त मूर्धन्य आदेश स्थानेऽन्तरतम की सहायता से गुण(प्रयत्न) की तुल्यता मिलाकर संवार, नाद, घोष महाप्राण प्रयत्न वाला ढकार होता है। अतः सूत्रार्थ में ढकारादेश कहा गया है। इस तरह से यह सूत्र इणन्त अङ्ग से परे षीध्वं, लुङ् और लिट् के धकार के स्थान पर ढकार आदेश करता है।

एधाञ्चकृद्वे। मध्यमपुरुष के बहुवचन में एधाञ्चकृ तक की प्रक्रिया पूर्ववत् ही होगी किन्तु ध्वम् के धकार के स्थान पर इणः षीध्वंलुङ्लिटां धोऽङ्गात् से ढकार आदेश करके एधाञ्चकृ द्वम् बन जाता है। द्वम् में टिसंज्ञक अम् के स्थान पर टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व होकर एधाञ्चकृद्वे बन गया।

एधाञ्चक्रे। उत्तमपुरुष के एकवचन में इट् प्रत्यय और अनुबन्धलोप करके एधाञ्चकृ तक की प्रक्रिया पूर्ववत् ही होगी किन्तु टिसंज्ञक इ के स्थान पर टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व होकर ए बना है। एधाञ्चकृ ए में इको यणचि से यण् होकर एधाञ्चक्र ए बना, वर्णसम्मेलन होकर एधाञ्चक्रे बना।

एधाञ्चकृवहे। एधाञ्चकृमहे। उत्तमपुरुष के द्विवचन और बहुवचन में क्रमशः वहि और महिङ् प्रत्यय होगें और अनुबन्धलोप करके एधाञ्चकृ तक की प्रक्रिया पूर्ववत् ही होगी किन्तु टिसंज्ञक इकार के स्थान पर टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व होकर वहे और महे बन जाता है। इस तरह एधाञ्चकृवहे और एधाञ्चकृमहे की सिद्धि हो जाती है।

इस तरह एध् धातु के लिट् लकार में कृ-धातु के अनुप्रयोग होने पर एधाञ्चक्रे, एधाञ्चक्राते, एधाञ्चक्रिरे, एधाञ्चकृषे, एधाञ्चक्राथे, एधाञ्चकृद्वे, एधाञ्चक्रे, एधाञ्चकृवहे, एधाञ्चकृमहे ये रूप सिद्ध हुए। एधाम् से भू धातु का अनुप्रयोग करके एधाम् भू बना लेने के बाद जैसे भू-धातु के लिट् लकार में आपने रूप बनाया है, उसी तरह यहाँ भी बनाइये और एधाम् बभूव में मकार के स्थान पर मोऽनुस्वारः से अनुस्वार और वा पदान्तस्य से परसवर्ण होकर मकार आदेश हो जाता है- एधाम्बभूव। भू-धातु स्वभावतः परस्मैपदी है, अतः यहाँ पर परस्मैपद में ही रूप बनते हैं। इसी प्रकार अस् धातु भी परस्मैपदी है।

एध्-धातु के लिट्-लकार में भू-धातु का अनुप्रयोग होने पर- एधाम्बभूव, एधाम्बभूवतुः, एधाम्बभूवुः, एधाम्बभूविथ, एधाम्बभूवथुः, एधाम्बभूव, एधाम्बभूव, एधाम्बभूविव, एधाम्बभूविम ये रूप सिद्ध होते हैं।

एध्-धातु के लिट्-लकार में अस् धातु का अनुप्रयोग होने पर अस् धातु से लिट् के स्थान पर तिप्, णल् आदेश, अस् का द्वित्व, हलादि शेषः से सकार का लोप करके अ अस् बना। अ+अस् में अत आदेः से दीर्घ होकर अकः सवर्णे दीर्घः से दीर्घ होकर आस् अ बना। एधाम् आस् अ में मकार आस् के आकार से मिला- एधामास् अ बना। वर्णसम्मेलन करके एधामास बन गया। एधामास् बनने तक की प्रक्रिया एक ही होगी और आगे अतुस् आदि प्रत्ययों को जोड़कर और जहाँ इट् प्राप्त है, वहाँ इट् का आगम करके निम्नलिखित रूप सिद्ध हो जायेंगे- एधामास। एधामासतुः। एधामासुः। एधामासिथ। एधामासथुः। एधामास। एधामास। एधामासिव। एधामासिम।

एधिता। एध्-धातु से लुट् लकार में- एध् लुट्, एध् त, एध् तास् त, एध् इतास् त, एधितास् त, एधितास् डा, एधितास् आ, एधित् आ, एधिता। यह प्रक्रिया आप समझ गये होंगे। इसी प्रकार से एधितारौ, एधितारः, एधितासे, एधितासाथे तक बनाइये।