Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 512
आत्मनेपदविधायकं विधिसूत्रम्
आम्प्रत्ययवत् कृञोऽनुप्रयोगस्य
Aṣṭādhyāyī 1.3.63
Vṛtti Varadarājācārya

आम्प्रत्ययो यस्मादित्यतद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः।

आम्प्रकृत्या तुल्यमनुप्रयुज्यमानात् कृञोऽप्यात्मनेपदम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५१२- आम्प्रत्ययवत्कृञोऽनुप्रयोगस्य। आम् प्रत्ययो यस्मात् स आम्प्रत्ययः, आम्प्रत्ययेन तुल्यम् आम्प्रत्ययवत्। आम्प्रत्ययवत् अव्ययपदं, कृञः पष्ठ्यन्तम्, अनुप्रयोगस्य पष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।

आम्-प्रकृति वाली धातु अर्थात् आम्-प्रत्यय जिस धातु से होता है, ऐसी धातु के समान अनुप्रयोग की जाने वाली कृ-धातु से भी आत्मनेपद ही होता है।

आम्-प्रत्ययो यस्मात्.....इत्यादि सूत्र में आये हुए आम्प्रत्ययवत् शब्दका अर्थ बताने के लिए विग्रह दिखाया गया है। यहाँ पर वत् प्रत्यय का इव(समान, तुल्य) अर्थ है और आम्प्रत्यय में अतद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि समास है।

बहुव्रीहि समास दो प्रकार का होता है- तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि और अतद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि। सामान्यतः बहुव्रीहि समास अन्य पदार्थ को कहता है पर जब केवल अन्यपदार्थ का ही ग्रहण किया जाता है अर्थात् समस्यमान पदों के अर्थ को छोड़ दिया जाता है तब अतद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि होता है और जब समस्यमान पद के अर्थ का भी अन्यपदार्थ के साथ में ग्रहण होता है तो तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि होता है। जैसे- दृष्टसागरं (पुरुषम्) आनय में दृष्टः सागरो येन स तम्= देख लिया है सागर जिसने ऐसे पुरुष को लाइये, इसमें केवल अन्यपदार्थ पुरुष को ही लाया जाता है न कि समस्यमान सागर पदार्थ को भी। अतः क्रिया में समस्यमान पदार्थ का सम्बन्ध न होने से यह अतद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि हुआ। इसी तरह आम् प्रत्ययो यस्मात् सः (आम् प्रत्यय हुआ जिससे वह) में भी आम् प्रत्यय जिससे होता है, ऐसा अन्य पदार्थ प्रकृति(मूल धातु) मात्र को लिया जाता है न कि आम् प्रत्यय को भी। अतः यहाँ भी अतद्गुणसंविज्ञान नामक बहुव्रीहि हुआ है। तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि में जैसे- लम्बकर्णम् आनय(बड़े-बड़े, लम्बे कान वाले वाले को लाइये) में लम्बे कान वाले अन्यपदार्थ पुरुष के साथ-साथ समस्यमान पदार्थ लम्बे कानों को भी लाया जाता है। अतः आनय क्रिया में अन्यपदार्थ के साथ-साथ समस्यमान पदार्थ का भी अन्वय हुआ। इसलिए इसमें तद्गुणसंविज्ञान नामक बहुव्रीहि समास माना जाता है।

जिससे आम्-प्रत्यय का विधान होता है, ऐसे धातु को आम्प्रकृतिक कहते हैं। कृ-धातु के ञित् होने से परस्मैपदी और आत्मनेपदी अर्थात् उभयपदी है। अतः यहाँ पर अनुप्रयुज्यमान कृ धातु में सन्देह हुआ कि आम्प्रकृतिक एष् धातु के बाद में प्रयोग होने पर भी कृ से दोनों पद हों या उनमें से कोई एक पद हो? इसी को बताने के लिए इस सूत्र को पढ़ा गया और इसने निर्णय दिया कि ऐसे अनुप्रयुज्यमान कृ-धातु से केवल आत्मनेपद ही हो। यह सन्देह केवल कृ-धातु के विषय में उपस्थित होता है, क्योंकि यह उभयपदी है। भू और अस् धातु केवल परस्मैपदी हैं, इसलिए उनमें कोई सन्देह नहीं है।