Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 511
आम्-विधायकं विधिसूत्रम्
इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः
Aṣṭādhyāyī 3.1.36
Vṛtti Varadarājācārya

इजादिर्यो धातुर्गुरुमानृच्छत्यन्यस्तत आम् स्याल्लिटि।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५११- इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः। इच् आदिर्यस्य स इजादिस्तस्माद् इजादेः। गुरुरस्त्यस्मिन् इति गुरुमान्, तस्माद् गुरुमतः। न ऋच्छ् अनृच्छ्, तस्मात् अनृच्छः। इजादेः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, गुरुमतः पञ्चम्यन्तम्, अनृच्छः पञ्चम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् से धातोः और कास्प्रत्ययादाममन्त्रे लिटि से लिटि की अनुवृत्ति आती है। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।

ऋच्छ धातु से भिन्न इजादि जो गुरु-वर्ण से युक्त धातु, उससे परे आम् प्रत्यय होता है लिट् के परे होने पर।

इच् एक प्रत्याहार है, वह आदि में है जिस धातु के, वह धातु इजादि हुआ। दीर्घवर्ण और संयोगपरक ह्रस्व-वर्ण की गुरुसंज्ञा होती है। अतः जिस धातु में दीर्घवर्ण या संयोग हो वह धातु गुरुमान् अर्थात् गुरुसंज्ञक वर्ण वाला होता है। ऋच्छ् धातु में च्छ् का संयोग है, अतः यह भी गुरुमान् हुआ। ऋच्छ्-धातु से आम् प्रत्यय अभीष्ट नहीं था, इसलिए निषेध करने के लिए सूत्र में अनृच्छः पढ़ा गया। आम् के मकार की इत्संज्ञा नहीं होती है। अतः पूरा आम् धातु से परे होता है। लिट् परे रहते विहित होने से धातु और लिट् के बीच में बैठ जाता है।