एधसे। एधेथे। एधध्वे। अतो गुणे। एधे। एधावहे। एधामहे।
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टितो लस्य थासः से स्यात्।
५१०- थासः से। थासः पष्ठ्यन्तं, से लुप्तप्रथमाकं पदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में टित आत्मनेपदानां टेरे से टितः की अनुवृत्ति आती है और लस्य सूत्र का अधिकार चल रहा है।
टित् लकार वाले थास् के स्थान पर से आदेश होता है।
एधसे। एध् से मध्यमपुरुष एकवचन थास्, सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप, एध् अ थास् बना। थासः से से थास् के स्थान पर से आदेश हुआ, वर्णसम्मेलन करके एधसे सिद्ध हुआ।
एधेथे। जैसे आताम् आने पर एधेते बनता है तो उसी प्रकार से आथाम् अर्थात् मध्यमपुरुष के द्विवचन आथाम् के आने पर एधेथे बनता है।
एधध्वे। एध् से मध्यमपुरुष का बहुवचन ध्वम् आया, शप्, ध्वम् में अम् की टिसंज्ञा और टि के स्थान पर टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व करके एध् अ ध्वे बना, वर्णसम्मेलन करके एधध्वे सिद्ध हुआ।
एधे। उत्तमपुरुष का एकवचन इट्, शप्, एध् अ इ में टिसंज्ञक इ के स्थान पर एत्व करके एध् अ ए बना। अ+ए में अतो गुणे से पररूप एकादेश होकर ए ही बना। वर्णसम्मेलन करके एधे सिद्ध होता है।
एधावहे। एध् से वहि, शप् करने के बाद टिसंज्ञक जो हि का इकार उसके स्थान पर टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व करने के बाद वहे बनेगा। वकार यज् प्रत्याहार में आता है। अतः अतो दीर्घो यजि से दीर्घ होकर एधावहे सिद्ध हो जाता है।
एधामहे। बहुवचन में महिङ् आयेगा। ङकार की इत्संज्ञा की जाती है। यह ङकार ङित्करण के लिए नहीं है, अपितु ति से ङ् तक गिनकर तिङ् प्रत्याहार बनाने के लिए है। शप् करने के बाद टिसंज्ञक जो हि का इकार उसके स्थान पर टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व करने के बाद महे बनेगा। मकार यज् प्रत्याहार में आता है। अतः अतो दीर्घो यजि से दीर्घ होकर एधामहे सिद्ध हो जाता है।
लट्- एधते, एधेते, एधन्ते, एधसे, एधेथे, एधध्वे, एधे, एधावहे, एधामहे।