Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
Show
VṛttiGovind
LSK 509
इयादेशविधायकं विधिसूत्रम्
आतो ङितः
Aṣṭādhyāyī 7.2.81
Vṛtti Varadarājācārya

अतः परस्य डितामाकारस्य इय् स्यात्। एधेते। एधन्ते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५०९- आतो डितः। आतः पष्ठ्यन्तं, डितः पष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अतो येयः यह पूरा सूत्र अनुवृत्त होकर, आता है और अङ्गस्य का अधिकार है।

अदन्त अङ्ग से परे डित्-प्रत्ययों के आकार के स्थान पर इय् आदेश होता है।

यह सूत्र आताम् और आथाम् के आकार के स्थान पर इय् आदेश करता है। यकार का लोपो व्योर्वलि से लोप हो जाता है।

एधेते। एध् धातु से प्रथमपुरुष का द्विवचन आताम् आया। एध्+आताम्, सार्वधातुक संज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप, एध् अ आताम् में आताम् की सार्वधातुकमपित् से डिद्वद्भाव करके आतो डितः से आताम् के आकार के स्थान पर इय् आदेश हुआ- एध् अ इय् ताम् बना। यकार का लोपो व्योर्वलि से लोप हुआ। एध् अ इ ताम् बना। अ+इ में आदगुणः से गुण हुआ, ए बना। एध् ए ताम् में वर्णसम्मेलन हुआ- एधेताम् बना। एधेताम् में अन्त्य अच् ताम् में आ है। अतः मकार सहित आ अर्थात् आम् की अचोऽन्त्यादि टि से टिसंज्ञा हुई और टि के स्थान पर टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व हुआ- एधेते बना।

एधन्ते। एध् धातु से प्रथमपुरुष का बहुवचन झ आया। झ् के स्थान पर झोऽन्तः से अन्त् आदेश हुआ अन्त्+अ बना। वर्णसम्मेलन हुआ तो अन्त बना। अन्त की सार्वधातुकसंज्ञा करके शप् हुआ, अनुबन्धलोप, एध् अ अन्त बना। अ+अन्त में अतो गुणे से पररूप होकर अन्त ही हुआ। एध्+अन्त में वर्णसम्मेलन और अन्त्य अच् तकारोत्तरवर्ती अकार की टिसंज्ञा और उसके स्थान पर टित आत्मनेपदानां टेरे एत्व हुआ- एधन्ते सिद्ध हुआ।