टितो लस्यात्मनेपदानां टेरेत्वम्। एधते।
एध वृद्धौ॥१॥
अभी तक आपने परस्मैपदी धातुओं का ज्ञान किया। अब हम आत्मनेपदी धातुओं को जानने के लिए आत्मनेपद में प्रवेश कर रहे हैं। कैसे धातुओं से आत्मनेपद का प्रयोग होता है, इस विषय में संक्षिप्त जानकारी भ्वादि के आदि में आपको मिल गई थी फिर भी याद दिला रहे हैं कि अनुदात्तङित आत्मनेपदम् इस सूत्र के अनुसार जो धातु अनुदात्तेत् अर्थात् अनुदात्त की इत्संज्ञा वाला हो और जो धातु ङित् हो, ऐसे धातुओं से आत्मनेपद का प्रयोग करना चाहिए। इसके अतिरिक्त भी अनेक सूत्र आत्मनेपद का विधान करते हैं किन्तु सर्वसामान्य यही सूत्र है।
लकार के स्थान पर आदेश होने वाले आत्मनेपदी प्रत्ययों को तालिका के माध्यम से पुनः स्मरण कर लें।
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथम-पुरुष
त
आताम्
झ
मध्यम-पुरुष
थास्
आथाम्
ध्वम्
उत्तम-पुरुष
इट्
वहिङ्
महिङ्
एध वृद्धौ। एध् धातु बढ़ना अर्थ में है। इस में धकारोत्तरवर्ती अकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होती है। अकार अनुदात्त स्वर वाला है, अतः यह धातु अनुदात्तेत् हुआ। इसलिए अनुदात्तङित आत्मनेपदम् सूत्र के नियम से इस धातु से आत्मनेपद का विधान हुआ। जिस धातु से आत्मनेपद का विधान होता है, वह धातु आत्मनेपदी होता है। अतः एध् धातु आत्मनेपदी है।
५०८- टित आत्मनेपदानां टेरे। टितः षष्ठ्यन्तम्, आत्मनेपदानां षष्ठ्यन्तं, टेः षष्ठ्यन्तम्, ए लुप्तप्रथमान्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में लस्य इस सूत्र का अधिकार है। इसलिए अर्थ में भी लकार के स्थान पर यह अर्थ आयेगा।
टित् लकार के आत्मनेपद प्रत्ययों के टि के स्थान पर एकार आदेश होता है।
टि संज्ञा है। अचोऽन्त्यादि टि से अन्त्य अच् की टिसंज्ञा होती है। केवल टि के स्थान पर ही यह ए आदेश होगा।
एधते। एध धातु का बढ़ना अर्थ है। धकारोत्तरवर्ती अकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा हुई और तस्य लोपः से लोप हुआ। एध् बचा। एध् से लट् लकार और उसके
स्थान पर आत्मनेपद में प्रथमपुरुष का एकवचन त आया। एध् त बना। त की तिङ्शित्सार्वधातुकम् से सार्वधातुकसंज्ञा हुई और कर्तरि शप् से शप् हुआ। अनुबन्धलोप, एध् अ त बना। वर्णसम्मेलन हुआ, एधत में तकारोत्तरवर्ती अन्त्य अच् अकार की अचोऽन्त्यादि टि से टिसंज्ञा हुई और टित आत्मनेपदानां टेरे से उसके स्थान पर एकार आदेश हुआ- एधते सिद्ध हुआ।