श्यन्विकरणपुषादेर्द्युतादेर्लृदितश्च परस्य च्लेरङ् परस्मैपदेषु।
अगमत्। अगमिष्यत्।
इति परस्मैपदिनः।
लोट्- गच्छतु-गच्छतात्, गच्छताम्, गच्छन्तु, गच्छ-गच्छतात्, गच्छतम्, गच्छत, गच्छानि, गच्छाव, गच्छाम। लङ्- अगच्छत्, अगच्छताम्, अगच्छन्, अगच्छः, अगच्छतम्, अगच्छत, अगच्छम्, अगच्छाव, अगच्छाम। विधिलिङ्- गच्छेत्, गच्छेताम्, गच्छेयुः, गच्छेः, गच्छेतम्, गच्छेत, गच्छेयम्, गच्छेव, गच्छेम। आशीर्लिङ्- गम्यात्, गम्यास्ताम्, गम्यासुः, गम्याः, गम्यास्तम्, गम्यास्त, गम्यासम्, गम्यास्व, गम्यास्म।
गमिष्यति। गम् धातु से लृट्-लकार, तिप्, सार्वधातुकसंज्ञा, शप् प्राप्त, उसे बाधकर स्यतासी लृलृटोः से स्य प्रत्यय, उसकी आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा और आर्धधातुकस्येड् वलादेः से इट् प्राप्त, उसे एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् निषेध प्राप्त, उसे भी बाधकर गमेरिट् परस्मैपदेषु से इट् का आगम, टित् होने के कारण स्य के आदि में स्थिति, इकार से परे स्य के सकार का आदेशप्रत्यययोः से षत्व करके गम्+इष्य+ति में वर्णसम्मेलन, गमिष्यति सिद्ध हुआ। इस प्रकार से लृट् में रूप बनते हैं- गमिष्यति, गमिष्यतः, गमिष्यन्ति, गमिष्यसि, गमिष्यथः, गमिष्यथ, गमिष्यामि, गमिष्यावः, गमिष्यामः।
गच्छतु। गम् धातु से लृट् लकार ले आकर गच्छति बनाइये और एकः से उत्व करके तो गच्छतु बन जायेगा। इसको समझने के लिए आप भू धातु की प्रक्रिया को स्मरण करें और इस धातु में छकारादेश और तुक् का आगम तथा चुत्व भी करें।
५०७- पुषादिद्युताद्यूलृदितः परस्मैपदेषु। पुष् आदिर्येषां ते पुषादयः, द्युत् आदिर्येषां ते द्युतादयः, लृत् इत् येषां ते लृदितः। पुषादयश्च द्युतादयश्च लृदितश्च तेषां समाहारद्वन्द्वः पुषादिद्युताद्यूलृदित्, तस्मात्। पुषादिद्युताद्यूलृदितः पञ्चम्यन्तं, परस्मैपदेषु सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। च्लेः सिच् से च्लेः तथा अस्यतिवक्तिख्यातिभ्योऽङ् से अङ् की अनुवृत्ति आती है।
पुष आदि धातु, द्युत आदि धातु तथा लृ इत्संज्ञक हों, ऐसे धातुओं से पर च्लि के स्थान पर अङ् आदेश होता है, परस्मैपद में।
पुषादि और द्युतादि गण हैं और लृ की इत्संज्ञा जिस धातु में होती है, उस धातु को लृदित् कहते हैं। इस सूत्र का कार्य च्लि के स्थान पर अङ् आदेश करना है। जैसे-, च्लि के स्थान पर अभी तक आप सिच् आदेश कर रहे थे, अब गम् आदि धातु में अङ् आदेश करेंगे। गम्लृ में लृ की इत्संज्ञा हुई है, अतः यह धातु लृदित् है।
अगमत्। गम् धातु से लृङ् लकार, अट् का आगम, लकार के स्थान पर तिप्, सार्वधातुकसंज्ञा, कर्तरि शप् से शप् प्राप्त था, उसे बाधकर च्लि लुङि से च्लि प्रत्यय, अनुबन्धलोप, उसके स्थान पर च्लेः सिच् से सिच् आदेश प्राप्त था, उसे बाधकर पुषादिद्युताद्यूलृदितः परस्मैपदेषु से अङ् आदेश हुआ। अगम् अत् बना। अनिट् धातु होने से इट् होना ही नहीं है। वर्णसम्मेलन करके अगमत् बनता है।
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लुङ् में- अगमत्, अगमताम्, अगमन्, अगमः, अगमतम्, अगमत, अगमम्, अगमाव, अगमाम।
लुङ् लकार में- स्य को गमेरिट् परस्मैपदेषु से इट् आगम होता है। अगमिष्यत्, अगमिष्यताम्, अगमिष्यन्, अगमिष्यः, अगमिष्यतम्, अगमिष्यत, अगमिष्यम्, अगमिष्याव, अगमिष्याम।
इस प्रकार से आपने भ्वादिगण में पठित परस्मैपदी धातुओं के विषय में जानकारी प्राप्त की। अब इसके बाद आत्मनेपद में प्रवेश करेंगे। उसके पहले आप अपनी परीक्षा भी कर लें कि अभी तक आपने जो अध्ययन किया है, उसमें आप कितने सफल हैं? यदि पूरी तैयारी नहीं हो पायी है तो पुनः एक बार पढ़ लें, प्रतिदिन आवृत्ति कर लें। पढ़ने के बाद प्रतिदिन आवृत्ति तो होनी ही चाहिए, अन्यथा सारा विस्मृत हो जायेगा। इस लिए आप जितना पढ़ रहे हैं, उससे ज्यादा अपने साथियों के साथ विमर्श भी करें, आप स्वयं प्रश्न पूछें या आप उत्तर दें। पूछने और बताने में कोई संकोच न करें। मुझे पूरा विश्वास है कि आप पाणिनीयाष्टाध्यायी की आवृत्ति बराबर कर रहे होंगे। आपका स्नान और भोजन भले छूट जाये किन्तु अष्टाध्यायी का पारायण नहीं छूटना चाहिए। जब तक अष्टाध्यायी के सारे सूत्र कण्ठस्थ नहीं होंगे, तब तक व्याकरणशास्त्र के विषय में समझ पाना कठिन होगा। अतः आपका अष्टाध्यायी पारायण का नियम निरन्तर चलना चाहिए। प्रतिमाह एक अध्याय के हिसाब से पारायण करेंगे तो प्रतिभाशाली छात्र को एक माह में एक अध्याय कण्ठस्थ हो जायेगा। इस हिसाब से तो आठ ही माह में पूरी अष्टाध्यायी कण्ठस्थ हो जाएगी। यदि आठ माह में नहीं भी कर सके तो सोलह माह में अवश्य कण्ठस्थ हो जायेगी।
परीक्षा का जो नियम बना हुआ है, उसका पालन कर पुस्तक का पूजन करें।
परीक्षा
सूचना- पहला प्रश्न ५० अंक का और शेष प्रश्न १०-१० अंक के हैं।
१- अभी तक भ्वादिगण में जितने धातु आपने पढ़े, उनके लिट् एवं लुङ् लकार के रूपों को विना पुस्तक के सहारे अपनी स्मरणशक्ति के बल पर पुस्तिका में उतारें।
२- भू के लुङ्, अत् के लिट्, सिध् के आशीर्लिङ्, गद् के लोट् और गम् के लुङ् लकार के प्रथमपुरुष-एकवचन की रूप की सिद्धि कीजिए।
३- आर्थधातुकस्येङ् वलादेः से किस-किस लकार में इट् आगम हो पाता है?
४- पाद्याध्यना- इस सूत्र को पूरा लिखकर इसकी वृत्ति, अर्थ और किस धातु के स्थान पर क्या आदेश होता है, इसका पूरा विवरण दीजिए।
५- अतो हलादेर्लघोः और वदव्रजहलन्तस्याचः की तुलना करिये।
६- उपसर्ग के विषय में आप कितना जानते हैं? बताइये।
इस तरह श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या में
भ्वादि का परस्मैपदप्रकरण पूर्ण हुआ।
अथात्मनेपदिनः