Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 504
छत्वविधायकं विधिसूत्रम्
इषुगमियमां छः
Aṣṭādhyāyī 7.3.77
Vṛtti Varadarājācārya

एषां छः स्यात् शिति। गच्छति। जगाम।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

गम्लृ गतौ। इस धातु का जाना अर्थ है। लृ की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होती है, केवल गम् ही शेष रहता है। गच्छति=जाता है।

५०४- इषुगमियमां छः। इषुश्च गमिश्च यम् च तेषामितरेतरद्वन्द्वः- इषुगमियमः, तेषाम् इषुगमियमाम्। इषुगमियमां षष्ठ्यन्तं, छः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में ष्ठिवुक्लमुचमां शिति से शिति की अनुवृत्ति आती है।

शित् के परे होने पर इष्, गम् और यम् धातु के स्थान पर छकार होता है।

अलोऽन्त्यस्य के नियम से अन्त्य मकार के स्थान पर छकार आदेश होता है।

गच्छति। गम्लृ से गम् बन जाने के बाद लृट्, तिप्, शप्, करके गम्+अ+ति में इषुगमियमां छः से मकार के स्थान पर छकार आदेश हुआ- गछ् अ ति बना। छे च से छकार को तुक् का आगम हुआ। अनुबन्धलोप हुआ, त् बचा, गत्छ् अति बना। छकार के योग में स्तोः श्चुना श्चुः से श्चुत्व होकर चकार बन गया, गच्छ्+अति बना। वर्णसम्मेलन हुआ- गच्छति।

लृट्- गच्छति, गच्छतः, गच्छन्ति, गच्छसि, गच्छथः, गच्छथ, गच्छामि, गच्छावः, गच्छामः।

जगाम। गम् धातु से लिट्, तिप्, णल्, अनुबन्धलोप होने के बाद गम् अ बना। गम् को द्वित्व, अभ्याससंज्ञा, अभ्यासलोप होकर गगम् अ बना। कुहोश्चुः से गकार के स्थान पर चुत्व होकर जकार आदेश हुआ- जगम् अ बना। शित् प्रत्यय के अभाव में इषुगमियमां छः ये छकार आदेश नहीं हुआ। जगम्+अ में अत उपधायाः से उपधा की वृद्धि हुई- जगाम् अ बना। वर्णसम्मेलन होने पर जगाम सिद्ध हुआ।