Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 503
हेर्लुग्विधायकं विधिसूत्रम्
उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात्
Aṣṭādhyāyī 6.4.106
Vṛtti Varadarājācārya

असंयोगपूर्वात् प्रत्ययोतो हेर्लुक्।

शृणु, शृणुतात्। शृणुतम्। शृणुत। गुणावादेशौ। शृणवानि। शृणवाव। शृणवाम।

अशृणोत्। अशृणुताम्। अशृण्वन्। अशृणोः। अशृणुतम्। अशृणुत।

अशृणवम्। अशृण्व, अशृणुव। अशृण्म, अशृणुम। शृणुयात्। शृणुयाताम्।

शृणुयुः। शृणुयाः। शृणुयातम्। शृणुयात। शृणुयाम्। शृणुयाव। शृणुयाम। श्रूयात्।

अश्रौषीत्। अश्रौष्यत्। गम्लृ गतौ॥२०॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५०३- उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात्। नास्ति संयोगः पूर्वो यस्मात्, स असंयोगपूर्वः, तस्मात् असंयोगपूर्वात्। उतः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, प्रत्ययात् पञ्चम्यन्तम्, असंयोगपूर्वात् पञ्चम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। अतो हेः से हेः और चिणो लुक् से लुक् की अनुवृत्ति आती है।

जिसके पूर्व में संयोग नहीं है, ऐसा प्रत्यय का अवयव जो उकार, उससे परे हि का लुक् हो जाता है।

शृणु, शृणुतात्। मध्यमपुरुष के एकवचन में शृणु+हि बनने के बाद एकपक्ष में तुह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम् से तातङ् होता है और तातङ् न होने के पक्ष में उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात् से हि का लुक् हो जाता है। इस तरह शृणु और शृणुतात् ये दो रूप सिद्ध हो जाते हैं। द्विवचन और बहुवचन में शृणुतम्, शृणुत बनते हैं।

शृणवानि। श्रु से मिप्, शृ आदेश, श्नु प्रत्यय, मेर्निः से नि आदेश, आङुत्तमस्य पिच्च से आट् का आगम करके शृणु+आनि बना। णु को गुण और अव् आदेश करके शृणवानि सिद्ध हुआ। वस् और मस् में आङुत्तमस्य पिच्च से आट् आगम और उसे पित् किये जाने के कारण असंयोगाल्लिट् कित् से कित्व नहीं हुआ। अतः गुणनिषेध भी नहीं हुआ। इस तरह शृणवाव, शृणवाम सिद्ध हुए।

लङ्- अशृणोत्, अशृणुताम्, अशृण्वन्, अशृणोः, अशृणुतम्, अशृणुत। अशृणवम्, अशृण्व-अशृणुव, अशृण्म-अशृणुम। वस्, मस् में लोपश्चास्यान्यतरस्याम् म्वोः से विकल्प से उ-लोप होकर दो-दो रूप सिद्ध होते हैं।

विधिलिङ् में यास् के स्थान पर इय् आदेश नहीं होता क्योंकि वह अदन्त अङ्ग से परे नहीं है अपितु लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य से पकार का लोप होकर बनते हैं- शृणुयात्, शृणुयाताम्, शृणुयुः, शृणुयाः, शृणुयातम्, शृणुयात, शृणुयाम्, शृणुयाव, शृणुयाम।

आशीर्लिङ् में सर्वत्र यास् के परे रहते श्रु को उकार को अकृत्सार्वधातुकयोः से दीर्घ होता है। श्रूयात्, श्रूयास्ताम्, श्रूयासुः, श्रूयाः, श्रूयास्तम्, श्रूयास्त, श्रूयासम्, श्रूयास्व, श्रूयास्म।

लुङ् के तिप् और सिप् में अनिट् होने से सिच् को इडागम नहीं होता परन्तु अपृक्त हल् त् औ स् को दीर्घ वाला ईट् आगम होता ह। अन्यत्र अपृक्त न होने से ईट् न होकर सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु से वृद्धि और सिच् से सकार को आदेशप्रत्यययोः से षत्व करके रूप बनते हैं- अश्रौषीत्, अश्रौष्याम्, अश्रौषुः, अश्रौषीः, अश्रौष्यम्, अश्रौष्ट, अश्रौषम्, अश्रौष्व, अश्रौष्म।

लृट्- अश्रोष्यत्, अश्रोष्यताम्, अश्रोष्यन्, अश्रोष्यः, अश्रोष्यतम्, अश्रोष्यत, अश्रोष्यम्, अश्रोष्याव, अश्रोष्याम।