Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 500
डिद्धद्भावविधायकम् अतिदेशसूत्रम्
सार्वधातुकमपित्
Aṣṭādhyāyī 1.2.4
Vṛtti Varadarājācārya

अपित्सार्वधातुकं डिद्धत्। शृणुतः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५००- सार्वधातुकमपित्। सार्वधातुकं प्रथमान्तम्, अपित् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र

में गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्डित् से डित् की अनुवृत्ति आती है।

अपित् ( पित्-भिन्न ) सार्वधातुक डित् की तरह होता है।

यह अतिदेश-सूत्र है। जो सार्वधातुक पित् न हो, उसे यह डित् जैसे होने का

अतिदेश करता है, अर्थात् डित् को मानकर होने वाले समस्त कार्य हो जाते हैं। डित् को

मानकर विडन्ति च से गुणवृद्धिनिषेध आदि कार्य होते हैं। परस्मैपद में तिप्, सिप् और मिप्

ये तीन प्रत्यय पित् हैं, अतः इनको डिद्धत् नहीं होता और शेष छः प्रत्ययों को डिद्धत् हो जाता

है किन्तु आत्मनेपद में तो कोई भी प्रत्यय पित् नहीं है, अर्थात् सभी अपित् हैं, अतः सभी

प्रत्ययों में डिद्वद्भाव हो जाता है। शप् में पकार की इत्संज्ञा होती है, अतः पित् होने के कारण डित् नहीं हो सका। फलतः भवति इत्यादि प्रयोगों में विडन्ति च से गुण का निषेध नहीं हुआ।