Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 499
शृ इत्यादेशविधायकं विधिसूत्रम्
श्रुवः शृ च
Aṣṭādhyāyī 3.1.74
Vṛtti Varadarājācārya

श्रुवः शृ इत्यादेशः स्यात्, शृनुप्रत्ययश्च। शृणोति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४९९- श्रुवः शृ च। श्रुवः पञ्चम्यन्तं, शृ लुप्तप्रथमाकं पदं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

स्वादिभ्यः शृनुः से शृनुः, कर्तरि शृप् से कर्तरि और सार्वधातुके यक् से सार्वधातुके की

अनुवृत्ति आती है।

कर्ता अर्थ को कहने वाले सार्वधातुक के परे होने पर श्रु के स्थान पर शृ

आदेश और उससे परे शृनु प्रत्यय भी होता है।

यह सूत्र दो कार्य एक साथ करता है- एक तो श्रु के स्थान पर शृ आदेश और

कर्तरि शृप् से प्राप्त शृप् को बाधकर शृनु प्रत्यय। शृनु में शकार की इत्संज्ञा होती है, नु मात्र

बचता है। शित् होने के कारण सार्वधातुकसंज्ञा होती है। अपित् सार्वधातुक बन जाने के

कारण सार्वधातुकमपित् से डित् होने के कारण नु परे रहते शृ को गुण निषेध हो जाता है।

शृणोति। श्रु से लट्, तिप्, शृप् प्राप्त, उसे बाधकर श्रुवः शृ च से श्रु के स्थान

पर शृ आदेश और शृनु प्रत्यय, अनुबन्धलोप होकर शृ नु ति बना। नु की सार्वधातुकसंज्ञा

करके अग्रिम सूत्र सार्वधातुकमपित् से डिद्धद्भाव करने के बाद शृ के ऋकार को

सार्वधातुकार्धधातुकयोः से प्राप्त गुण का विडन्ति च से निषेध हो गया किन्तु ति को

सार्वधातुक मानकर नु के उकार को उक्त सूत्र से गुण हुआ। शृ+नोति बना। ऋवर्णान्नस्य

णत्वं वाच्यम् इस वार्तिक से नकार को णत्व करके शृणोति सिद्ध हुआ।