हुश्नुवोरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्योवर्णस्य यण् स्यादचि सार्वधातुके।
शृण्वन्ति।शृणोषि।शृणुथः।शृणुथ।शृणोमि।
शृणुतः। श्रु से लट्, तस्, शप् प्राप्त, उसे बाधकर शृ आदेश और श्नु प्रत्यय करके शृ+नु+तस् बना। श्नु और तस् दोनों अपित् और सार्वधातुक हैं। अतः सार्वधातुकमपित् से दोनों को डिद्वद्भाव करके दोनों जगह विडन्ति च से गुण का निषेध होने पर शृणुतः बना। ५०१- हुश्नुवोः सार्वधातुके। हुश्च श्नुश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वो हुश्नुवौ, तयोर्हुश्नुवोः। हुश्नुवोः षष्ठ्यन्तं, सार्वधातुके सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियडुवडौ से अचि, इणो यण् से यण्, एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य से अनेकाचः और असंयोगपूर्वस्य तथा ओः सुपि से ओः की अनुवृत्ति आती है।
हु धातु और श्नु-प्रत्ययान्त जो अनेकाच् अङ्ग, उसके असंयोगपूर्व उकार के स्थान पर यण् आदेश होता है अजादि सार्वधातुक परे हो तो।
हु और श्नु के उकार को गुण होता है यदि श्नु के उकार के पहले संयोग न हो, और नु को लेकर अनेकाच् बनता हो तो। किसी भी धातु में नु के लगने के बाद तो अनेकाच् बनेगा ही। अनेकाच् अङ्ग और उकार से पूर्व संयोग न हो, ऐसा कहने से आप्+नु+अन्ति में उकार से पहले पकार और नकार का संयोग है। अतः वहाँ यण् न होकर उवड् होता है।
शृण्वन्ति। श्रु से झि, अन्त् आदेश, शृ आदेश और श्नु प्रत्यय करके शृनु+अन्ति बना। शृनु अनेकाच् अङ्ग है और नु का उकार असंयोगपूर्व भी है अर्थात् उकार के पहले संयोग भी नहीं है। अतः हुश्नुवोः सार्वधातुके से उकार के स्थान पर यण् होकर व् आदेश हुआ। शृन्व्+अन्ति में णत्व और वर्णसम्मेलन करके शृण्वन्ति सिद्ध हुआ।
शृणोषि। शृणोति की तरह इसे भी बनाइये। शृणोमि भी इसी तरह बनता है। शृणुतः की तरह शृणुथः और शृणुथ भी बनता है।