अर्तेः संयोगादेर्ऋदन्तस्य च गुणः स्याद्यकि यादावार्धधातुके लिङि च।
ह्वर्यात्।
अह्वार्षीत्। अह्वरिष्यत्। श्रु श्रवणे॥१९॥
४९८- गुणोऽर्तिसंयोगाद्योः। अर्तिश्च संयोगादिश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वः, अर्तिसंयोगादी, तयोः अर्तिसंयोगाद्योः। रीङ् ऋतः से ऋतः तथा अकृत्सार्वधातुकयोः से असार्वधातुके एवं रिङ् शयग्लिङ्क्षु से यग्लिङोः और अयङ् यि क्ङिति से यि की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य का अधिकार आ रहा है।
ऋ-धातु तथा संयोगादि ऋदन्त धातु के अङ्ग को गुण होता है यक् अथवा यकारादि धातु के परे होने पर।
अर्ति से ऋ धातु को लिया गया है। ऋतः की अनुवृत्ति लाकर संयोगादि को उसका विशेषण बनाया गया है। संयोगादि जो ऋदन्त धातु। यहाँ ह्व संयोगादि ऋदन्त धातु है। यासुट् आगम होने पर यकारादि आर्धधातुक मिलता है। क्ङिति च से प्राप्त निषेध में यह गुण करता है।
ह्वर्यात्। ह्व से आशीर्लिङ्, तिप्, लिङाशिषि से आर्धधातुकसंज्ञा, यासुट् का आगम करके उसको किदाशिषि से कित्व किये जाने के कारण ह्व+यास्+त् में प्राप्त गुण का क्ङिति च से निषेध प्राप्त था। गुणोऽर्तिसंयोगाद्योः से गुण हुआ। ह्वर्+यास्+त् बना। सकार का स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से लोप होकर वर्णसम्मेलन हुआ- ह्वर्यात्।
आशीर्लिङ्- ह्वर्यात्, ह्वर्यास्ताम्, ह्वर्यासुः, ह्वर्याः, ह्वर्यास्तम्, ह्वर्यास्त, ह्वर्यासम्, ह्वर्यास्व, ह्वर्यास्म।
अह्वार्षीत्। लुङ्, तिप्, इकार का लोप, च्लि, सिच्, ईट् का आगम, अट् का आगम आदि होकर अह्व+स्+ईत् बना है। सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु से ऋकार की वृद्धि होकर अह्वार्+स्+ईत् बना। रेफ इण् में आता है। अतः आदेशप्रत्यययोः से षत्व होकर वर्णसम्मेलन हुआ- अह्वार्षीत्।
लृङ्- अह्वार्षीत्, अह्वार्ष्टम्, अह्वार्षुः, अह्वार्षीः, अह्वार्ष्टम्, अह्वार्ष्ट, अह्वार्षम्, अह्वार्ष्व, अह्वार्ष्म।
लृङ् में ऋद्धनोः स्ये से इट् आगम होता है। रूप- अह्वरिष्यत्, अह्वरिष्यताम्, अह्वरिष्यन्,
अह्वरिष्यः, अह्वरिष्यतम्, अह्वरिष्यत, अह्वरिष्यम्, अह्वरिष्याव, अह्वरिष्याम।
ह्व की तरह स्मृ चिन्तायाम् के भी रूप बनते हैं। स्मरति। सस्मार। स्मर्ता।
स्मरिष्यति। स्मरतु। अस्मरत्। स्मरेत्। स्मर्यात्। अस्मार्षीत्। अस्मरिष्यत्।
श्रु श्रवणे। श्रु धातु सुनने के अर्थ में है।