ऋतो हन्तेश्च स्यस्येट्। ह्वरिष्यति। ह्वरतु। अह्वरत्। ह्वरेत्।
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४९७- ऋद्धनोः स्ये। ऋत् च हन् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः ऋद्धनो, तयोः ऋद्धनोः। ऋद्धनोः
षष्ठ्यन्तं, पञ्चम्यर्थे षष्ठी। स्ये सप्तम्यन्तं, षष्ठ्यर्थे सप्तमी। द्विपदमिदं सूत्रम्। आर्धधातुस्येड्वलादेः
से इट् की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य का अधिकार है।
ऋदन्त धातु तथा हन् धातु से परे स्य को इट् का आगम होता है।
हन् और ऋकारान्त धातुओं के अनुदात्त और एकाच् होने के कारण अनिट् होने से तासि प्रत्यय के परे भी अनिट् हैं और स्य के परे भी अनिट् ही थे परन्तु आचार्य स्य को इट् आगम करना चाहते हैं। अतः उन्होंने इस सूत्र का आरम्भ किया। हन् धातु का उदाहरण अदादि में मिलता है। यहाँ पर केवल ऋदन्त का उदाहरण है।
ह्वरिष्यति। ह्व से लृट्, तिप्, स्य, आर्धधातुकसंज्ञा, अनुदात्त धातु होने के कारण एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से इट् का निषेध प्राप्त था, स्य के परे ऋद्धनोः स्ये से इट् का विधान किया गया। ह्व+स्य+ति में इट् आगम करके ह्व के ऋकार को सार्वधातुकार्धधातुयोः से गुण करके ह्वर्+इ+स्य+ति बना। इकार से परे सकार को षत्व करके वर्णसम्मेलन करने पर ह्वरिष्यति सिद्ध हुआ।
लृट् में- ह्वरिष्यति, ह्वरिष्यतः, ह्वरिष्यन्ति, ह्वरिष्यसि, ह्वरिष्यथः, ह्वरिष्यथ, ह्वरिष्यामि, ह्वरिष्यावः, ह्वरिष्यामः।
लोट्- ह्वरतु-ह्वरतात्, ह्वरताम्, ह्वरन्तु, ह्वर-ह्वरतात्, ह्वरतम्, ह्वरत, ह्वराणि, ह्वराव, ह्वराम।
लङ्- अह्वरत्, अह्वरताम्, अह्वरन्, अह्वरः, अह्वरतम्, अह्वरत, अह्वरम्, अह्वराव, अह्वराम।
विधिलिङ्- ह्वरेत्, ह्वरेताम्, ह्वरेयुः, ह्वरेः, ह्वरेतम्, ह्वरेत, ह्वरेयम्, ह्वरेव, ह्वरेम।