ऋदन्तस्य संयोगादेरङ्गस्य गुणो लिटि। उपधाया वृद्धिः। जह्वार। जह्वरतुः।
जह्वरुः। जह्वर्थः। जह्वरथुः। जह्वर। जह्वार, जह्वर। जह्वरिव, जह्वरिम।
ह्वर्ता।
४९६- ऋतश्च संयोगादेः। संयोगः आदिर्यस्य स संयोगादिः, तस्य संयोगादेः। ऋतः
षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, संयोगादेः षष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। दयेतेर्दिगि लिटि से लिटि की
अनुवृत्ति आती है।
संयोग आदि में हो ऐसे ऋदन्त अङ्ग को गुण होता है लिट् के परे होने पर।
यद्यपि तिप् में इस सूत्र की आवश्यकता नहीं है। ह्व से लिट्, तिप्, णल्, अ, ह्व
को द्वित्व होकर उरत् से अर् करके हलादिशेष, ह्वह्व+अ, कुहोश्चुः से चुत्व करके जकार
और अचो ज्याति से वृद्धि करने पर जह्वार बन जाता है किन्तु तस् आदि में वृद्धि नहीं
होती है। अतः इस सूत्र की आवश्यकता होती है। जब सूत्र पढ़ा ही गया है और अन्य सूत्रों
का अपवाद भी बन रहा है तो तिप् में भी यह सूत्र प्रवृत्त होगा।
जह्वार। ह्व से लिट्, तिप्, णल् करके द्विर्वचनेऽचि के अनुसार सर्वप्रथम द्वित्व,
उरत् से अर्, हलादिशेष, चुत्व करके झ आदेश, अभ्यासे चर्च से झकार के स्थान पर
जकार आदेश करके जह्व+अ बना। अब अचो ज्याति से वृद्धि प्राप्त थी, उसे बाधकर के
ऋतश्च संयोगादेः से गुण होकर जह्वर्+अ बना। अब अत उपधायाः से उपधा की वृद्धि
करके जह्वार+अ, वर्णसम्मेलन करके जह्वार सिद्ध हुआ। तस् आदि में भी यही प्रक्रिया
होती है। वहाँ पर वृद्धि प्राप्त नहीं होती है किन्तु सार्वधातुकार्धधातुकयोः से प्राप्त गुण का
असंयोगाल्लिट् कित् से कित्व होने के कारण विडन्ति च से निषेध हो रहा था। अतः
ऋतश्च संयोगादेः से पुनः गुण होता है। थल् में ऋदन्त धातु होने के कारण अन्यमत और
भारद्वाजमत दोनों के नियम से इट् नहीं होता है। इस तरह लिट् में रूप बने- जह्वार, जह्वरतुः,
जह्वरुः, जह्वर्थ, जह्वरथुः, जह्वर, जह्वार-जह्वर, जह्वरिव, जह्वरिम।
अनिट् होने के कारण लुट् में- ह्वर्ता, ह्वर्तरि, ह्वर्तरः, ह्वर्तसि, ह्वर्तस्थः, ह्वर्तस्थ,
ह्वर्तस्मि, ह्वर्तस्वः, ह्वर्तस्मः।