एषां सक् स्यादेभ्यः सिच इट् स्यात् परस्मैपदेषु।
अग्लासीत्। अग्लास्यत्। ह्व ( ह्व ) कौटिल्ये॥१८॥ ह्रति।
४९५- यमरमनमातां सक् च। यमश्च रमश्च नमश्च आत् च तेषामितरेतरद्वन्द्वः यमरमनमातः, तेषां यमरमनमातां षष्ठ्यन्तं, सक् प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। अञ्जेः सिचि से सिचि तथा स्तुसुधूञ्भ्यः परस्मैपदेषु से परस्मैपदेषु एवं इङ्त्यर्तिव्ययतीनाम् से इट् की अनुवृत्ति आती है।
परस्मैपद मे सिच् परे होने पर यम्, रम्, नम् तथा आकारान्त धातुओं सक् का आगम और साथ ही सिच् को इट् का आगम भी होता है।
यह सूत्र दो कार्य करता है- सक् का आगम और सिच् को इट् का आगम। सक् में ककार की इत्संज्ञा होती है और सकारोत्तरवर्ती अकार उच्चारणार्थक है। अतः केवल स् मात्र शेष बचता है।
अग्लासीत्। ग्लै से लुङ्, तिप्, सिच्, आत्व, अस्तिसिच्रोऽपृक्ते से ईट् आगम करके अग्ला+स्+ईत् बना। ग्ला यह आकारान्त अङ्ग है। अतः यमरमनमातां सक् च से सक् और इट् होकर अग्ला+स्+ई+स्+ईत् बना। इट ईटि से सकार का लोप करके इ+ई में सवर्णदीर्घ होकर अग्ला+स्+ईत् बना। वर्णसम्मेलन होकर अग्लासीत् सिद्ध हुआ। द्विवचन में ईट् आगम नहीं होगा किन्तु सक् और इट् आगम होंगे, अतः सिच् के सकार का लोप भी नहीं होगा। अग्लास्+इ+स्+ताम् है। इकार से परे सकार को षकार और उससे परे तकार को ष्टुत्व होकर वर्णसम्मेलन करने पर अग्लासिष्टाम् सिद्ध हुआ।
लुङ्- अग्लासीत्, अग्लासिष्टाम्, अग्लासिषुः, अग्लासीः, अग्लासिष्टम्, अग्लासिष्ट, अग्लासिषम्, अग्लासिष्व, अग्लासिष्म। लृङ्- अग्लास्यत्, अग्लास्यताम्, अग्लास्यन्, अग्लास्यः, अग्लास्यतम्, अग्लास्यत, अग्लास्यम्, अग्लास्याव, अग्लास्याम।
ह्व कौटिल्ये। ह्+व्=ह्व यह धातु कुटिल व्यवहार करना अर्थ में है। अनिट् है। इस धातु का प्रयोग कम ही होता है।
ह्वरति। ह्व से लट्, तिप्, शप्, गुण करके ह्व+अर्+अ+ति, वर्णसम्मेलन करके
ह्वरति सिद्ध होता है।