घुमास्थादेरन्यस्य संयोगादेर्धातोरात एत्वं वाऽऽर्धधातुके किति लिङि।
ग्लेयात्, ग्लायात्।
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४९४- वान्यस्य संयोगादेः। संयोगः आदिर्यस्य स संयोगादिः, तस्य संयोगादेः। वा अव्ययपदम्,
अन्यस्य षष्ठ्यन्तं, संयोगादेः षष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। एलिङि से लिङि, आतो लोप
इटि च से आतः और दीडो युडचि किङति से किति की अनुवृत्ति आती है। आर्धधातुके
और अङ्गस्य का अधिकार है।
घु, मा, स्था आदि धातुओं से अतिरिक्त संयोगादि धातु के आकार के
स्थान पर एकार आदेश विकल्प होता है आर्धधातुक कित् लिङ् परे हो तो।
अष्टाध्यायी के क्रम में इससे दो सूत्र पहले घुमास्थागापाजहातिसां हलि यह
सूत्र पढ़ा गया है। उसमें पठित धातुओं से भिन्न धातुओं को अन्यस्य से कहा गया है। पूर्व प्रसंग में आये धातुओं से अन्य धातुएँ यदि संयोगादि हों और अन्त में आकार हो तो ऐसे धातुओं के आकार के स्थान पर एकार आदेश कित् लिङ् अर्थात् आशीर्लिङ् के यासुट् के परे होने पर होता है।
ग्लेयात्, ग्लायात्। ग्लै से आशीर्लिङ्, तिप्, यासुट् आगम, कित्व करके आदेच उपदेशेऽशिति से आत्व होकर ग्ला+यास्+त् बना। वान्यस्य संयोगादेः से वैकल्पिक एकार आदेश करने पर ग्लेयास् त् बना। संयोगादि सकार का लोप करके ग्लेयात् बना। एकार आदेश न होने के पक्ष में आकार ही रह जाता है, ग्लायात्। इस तरह दो रूप बनते हैं। आशीर्लिङ् में एत्वपक्ष में- ग्लेयात्, ग्लेयास्ताम्, ग्लेयासुः, ग्लेयाः, ग्लेयास्तम्, ग्लेयास्त, ग्लेयासम्, ग्लेयास्व, ग्लेयास्म। एत्व न होने पर ग्लायात्, ग्लायास्ताम्, ग्लायासुः, ग्लायाः, ग्लायास्तम्, ग्लायास्त, ग्लायासम्, ग्लायास्व, ग्लायास्म।