उपदेशे एजन्तस्य धातोरात्त्वं न तु शिति।
जग्लौ। ग्लाता। ग्लास्यति। ग्लायतु। अग्लायत्। ग्लायेत्।
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४९३- आदेच उपदेशेऽशिति। श् इत् यस्य स शित्, न शित् अशित्, तस्मिन्(विषये)
अशिति, नञ्तत्पुरुष। लिटि धातोरनभ्यासस्य से धातोः की अनुवृत्ति आती है।
उपदेश अवस्था में एजन्त धातु के अन्त्य अल् के स्थान पर आकार आदेश
होता है परन्तु शित्प्रत्यय का विषय हो तो नहीं।
लिट्, लुट्, लृट्, आशीर्लिङ्, लुङ्, लृङ् इन लकारों में शप्, श्यन् आदि नहीं
होता, अतः ये अशित् हैं। इन लकारों में यह सूत्र लगता है और लट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ्
इन लकारों में शित् होने के कारण नहीं लगता। अलोऽन्त्यस्य की सहायता से एच् अर्थात्
ए, ओ, ऐ, औ के स्थान पर आकार आदेश होता है।
जग्लौ। ग्लै से लिट्, तिप्, णल्, ग्लै+अ बना। आदेच उपदेशेऽशिति से ऐकार
के स्थान पर आकार आदेश हुआ, ग्ला+अ बना। आत औ णलः से णल् वाले अकार के
स्थान पर आकार आदेश होकर ग्ला+औ बना। ग्ला को द्वित्व, हलादि शेष करके
गाग्ला+औ बना। ह्रस्वः से गा को ह्रस्व होकर गग्ला बना। कुहोश्चुः से चुत्व होकर
जग्ला+औ बना। वृद्धि होकर जग्लौ सिद्ध हुआ। ग्लै को आत्व करने के बाद यह पा धातु
के जैसा आकारान्त बन जाता है। अतः पपतुः, पपुः आदि की तरह जग्लतुः, जग्लुः,
जग्लिथ-जग्लाथ, जग्लथुः, जग्ल, जग्लौ, जग्लिव, जग्लिम बन जाते हैं। स्मरण रहे कि
अशित् प्रत्ययों के परे आत्व होता है।
लुट्- ग्लाता, ग्लातारौ, ग्लातारः, ग्लातासि, ग्लातास्थः, ग्लातास्थ, ग्लातास्मि, ग्लातास्वः,
ग्लातास्मः। लृट्- ग्लास्यति, ग्लास्यतः, ग्लास्यन्ति, ग्लास्यसि, ग्लास्यथः, ग्लास्यथ,
ग्लास्यामि, ग्लास्यावः, ग्लास्यामः। लोट्- ग्लायतु-ग्लायतात्, ग्लायताम्, ग्लायन्तु,
ग्लाय-ग्लायतात्, ग्लायतम्, ग्लायत, ग्लायानि, ग्लायाव, ग्लायाम। लङ्- अग्लायत्,
अग्लायताम्, अग्लायन्, अग्लायः, अग्लायतम्, अग्लायत, अग्लायम्, अग्लायाव, अग्लायाम।
विधिलिङ्- ग्लायेत्, ग्लायेताम्, ग्लायेयुः, ग्लायेः, ग्लायेतम्, ग्लायेत, ग्लायेयम्,
ग्लायेव, ग्लायेम।