Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
Show
VṛttiGovind
LSK 492
पररूपविधायकं विधिसूत्रम्
उस्यपदान्तात्
Aṣṭādhyāyī 6.1.96
Vṛtti Varadarājācārya

अपदान्तादकारादुसि परे पररूपमेकादेशः।

अपुः। अपास्यत्। ग्लै हर्षक्षये॥१७॥

ग्लायति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४९२- उस्यपदान्तात्। न पदान्तम् अपदान्तम्, तस्मात् अपदान्तात्। उसि सप्तम्यन्तम्, अपदान्तात् पञ्चम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में आद्गुणः से आत् और इको यणचि से अचि की अनुवृत्ति तथा एकः पूर्वपरयोः का पूरा अधिकार आ रहा है।

अपदान्त अकार से उस् के परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर पररूप एकादेश होता है।

अपुः। पा धातु से लुङ्, झि, अट् का आगम, च्लि, सिच्, सिच् के लुक् हो जाने पर अ पा झि बना हुआ है। झि के स्थान पर आतः से जुस् आदेश, अनुबन्धलोप, अपा+उस् बना। आद्गुणः से गुण प्राप्त था, उसे बाधकर उस्यपदान्तात् से पा में आकार और उस् के उकार के स्थान पर पररूप होकर उकार ही आदेश हुआ। अप्+उस् बना। वर्णसम्मेलन होकर सकार का रुत्वविसर्ग हुआ- अपुः।

इस प्रकार से लुङ् लकार में निम्नलिखित रूप बन जाते हैं- अपात्, अपाताम्, अपुः, अपाः अपातम्, अपात, अपाम्, अपाव, अपाम।

लृङ् लकार में- अपास्यत्, अपास्यताम्, अपास्यन्, अपास्यः, अपास्यतम्, अपास्यत, अपास्यम्, अपास्याव, अपास्याम।

ग्लै हर्षक्षये। ग्लै धातु हर्षक्षय अर्थात् दुःखी होना, मुरझाना, थकना आदि अर्थ में है। अन्त में ऐ होने के कारण यह एजन्त धातु है। किसी वर्ण की इत्संज्ञा नहीं होती है।

ग्लायति। ग्लै से लट्, तिप्, शप् करके ग्लै+अति बना। ऐकार के स्थान पर आय्

आदेश होकर ग्ल्+आय्+अति=ग्लायति सिद्ध हुआ। ग्लायतः, ग्लायन्ति आदि।