सिज्लुकि आदन्तादेव झेर्जुस्।
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४९१- आतः। आतः पञ्चम्यन्तम्, एकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च से सिचः और झेर्जुस् पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आती है।
सिच् के लुक् होने पर आदन्त धातु से परे ही झि को जुस् आदेश होता है, अन्य धातुओं से परे को नहीं।
गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु से सिच् का लुक् हो चुका होता है, अतः सिच् का अर्थ सिच् का लुक् होने पर ऐसा अर्थ किया गया। यह सूत्र नियमार्थ है, क्योंकि झि के स्थान पर जुस् आदेश सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च से भी सिद्ध है। सिद्धे सत्यारम्भमाणो विधिर्नियमाय भवति। यहाँ यह नियम बनता है कि सिच् का लुक् होने पर यदि झि को जुस् आदेश करना हो तो वह केवल आकारान्त धातुओं से परे ही हो, अन्य धातुओं से नहीं।